आगर वन परिक्षेत्र में शीतकालीन गिद्ध गणना संपन्न: माहरुंडी बीट में मिले दुर्लभ सफेद गिद्ध

नलखेड़ा, अग्निपथ। शासन के निर्देशानुसार 20, 21 एवं 22 फरवरी को आगर वन परिक्षेत्र के अंतर्गत शीतकालीन गिद्ध गणना का कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इस गणना के दौरान वन्यजीव प्रेमियों के लिए उत्साहजनक खबर सामने आई है। माहरुंडी बीट क्षेत्र में इजिप्शियन गिद्ध (सफेद गिद्ध) प्रजाति के 02 गिद्ध दिखाई दिए हैं। विशेष बात यह है कि यहाँ इस दुर्लभ प्रजाति का 01 सक्रिय घोंसला भी पाया गया है। भारतीय उपमहाद्वीप की यह छोटी प्रजाति पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो मध्यप्रदेश में ही आवास और प्रजनन करती है।

डिजिटल तकनीक से हुआ सटीक डेटा संकलन

इस बार की गिद्ध गणना में आधुनिकता का समावेश देखा गया। संपूर्ण डेटा का संकलन मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से किया गया, जिससे जानकारी पूरी तरह सटीक, पारदर्शी और जियो-टैग आधारित रही। इस डिजिटल अभिलेखीकरण से भविष्य में संरक्षण की योजनाएं बनाने में काफी मदद मिलेगी। गणना का मुख्य उद्देश्य गिद्धों की संख्या का आंकलन करना और उनकी सुरक्षा के लिए बनाई गई रणनीतियों को और अधिक मजबूत करना है।

मध्यप्रदेश में गिद्धों का कुनबा बढ़ा: 2025 तक संख्या 12,710 पहुंची

राज्य में गिद्धों के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयास रंग ला रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 में प्रदेश में गिद्धों की संख्या 6,999 थी, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 12,710 हो गई है। यह उल्लेखनीय वृद्धि वैज्ञानिक निगरानी, घोंसला स्थलों के संरक्षण और प्रतिबंधित औषधि डाइक्लोफेनाक पर लगाए गए प्रभावी नियंत्रण का परिणाम है। स्थानीय समुदायों की सहभागिता ने भी इस मुहिम को नई ताकत दी है।

रेंजर चौधरी के मार्गदर्शन में टीम ने निभाई सक्रिय भूमिका

आगर मालवा वन परिक्षेत्र में रेंजर श्री लक्ष्मी नारायण चौधरी के कुशल मार्गदर्शन में इस गणना कार्य को अंजाम दिया गया। इस महत्वपूर्ण कार्य में परिक्षेत्र सहायक बड़ौद श्री मयंक श्रीवास्तव सहित वन रक्षक श्री गोविंद शर्मा, श्री पदम परमार, श्री राकेश कुमार कुम्भकार, श्री विपिन कुमार शर्मा, श्री अर्जुन, श्री धीरज माली एवं श्री कृष्णपाल झाला ने निष्ठापूर्वक अपना सहयोग प्रदान किया।

प्रकृति के सफाईकर्मी हैं गिद्ध: अनावश्यक हस्तक्षेप न करने की अपील

गिद्धों को प्रकृति का ‘सफाईकर्मी’ कहा जाता है क्योंकि ये मृत पशुओं के अवशेषों को नष्ट कर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं। ये एन्थ्रेक्स और रेबीज जैसी घातक बीमारियों को फैलने से रोकने में सहायक होते हैं। वन परिक्षेत्र अधिकारी ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे गिद्धों के प्राकृतिक आवासों में हस्तक्षेप न करें और पशुओं के उपचार में प्रतिबंधित दवाओं का उपयोग न कर वन्यजीव संरक्षण में अपना सहयोग दें।

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