उज्जैन, अग्निपथ। शिप्रा के पावन तट पर अपने आशियाने को बचाने की जंग लड़ रहे सैकड़ों परिवारों के लिए न्याय की एक किरण जागी है। इंदौर हाईकोर्ट ने उज्जैन नगर निगम द्वारा नदी किनारे स्थित मकानों को तोड़ने के लिए जारी किए गए नोटिसों पर अंतरिम रोक लगा दी है। इस फैसले के बाद उन गरीब बस्तियों में खुशियों की लहर दौड़ गई है, जहाँ पिछले कई दिनों से बुलडोजर का खौफ साए की तरह मंडरा रहा था।
आशियाने पर मंडरा रहे थे संकट के बादल
मामला उज्जैन के उन रहवासियों से जुड़ा है जो दशकों से नदी के समीपवर्ती क्षेत्रों में रह रहे हैं। नगर निगम ने नदी शुद्धिकरण और सौंदर्यीकरण योजना के तहत इन मकानों को अवैध बताते हुए तोड़ने का नोटिस जारी किया था। इसके बाद से ही परिवारों में हड़कंप मचा हुआ था। बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक, हर कोई इस डर में जी रहा था कि वर्षों की मेहनत से बनाया गया उनका घर मिट्टी में मिल जाएगा। कई परिवारों का कहना था कि उनके पास वैध दस्तावेज और बिजली-पानी के बिल होने के बावजूद उन्हें बेदखल करने की तैयारी की जा रही थी।
अदालत ने पूछा- वैकल्पिक व्यवस्था कहाँ है?
पीड़ित पक्ष की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। माननीय न्यायालय ने अंतरिम स्थगन आदेश जारी करते हुए निगम प्रशासन से जवाब तलब किया है। अदालत का रुख मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत रहा, जिसमें यह चिंता जताई गई कि बिना किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास योजना के इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बेघर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकास की राह में मानवीय अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
बस्तियों में मना जश्न, आँखों में छलके खुशी के आँसू
जैसे ही हाईकोर्ट के इस आदेश की खबर उज्जैन पहुँची, नदी किनारे बसी बस्तियों में माहौल बदल गया। लोग एक-दूसरे को गले लगाकर बधाई देते नजर आए। कई महिलाओं ने इसे भगवान महाकाल का आशीर्वाद बताया। एक बुजुर्ग रहवासी ने भावुक होते हुए कहा, “हमारा अपराध बस इतना था कि हम गरीब हैं और नदी के किनारे रहते हैं। कोर्ट के इस फैसले ने हमें फिर से चैन की नींद सोने का हक दिया है।” अब इस मामले की अगली सुनवाई तक निगम कोई भी दंडात्मक या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं कर पाएगा।
प्रशासन से विस्तृत जवाब की प्रतीक्षा
अब सबकी नजरें उज्जैन नगर निगम के जवाब पर टिकी हैं। प्रशासन को यह साबित करना होगा कि उनकी यह कार्रवाई कानून के दायरे में है और प्रभावितों के लिए उनके पास क्या योजना है। फिलहाल, इस स्थगन आदेश ने उन लोगों को अपनी बात मजबूती से रखने का समय दे दिया है, जिनके पास खोने के लिए सिर्फ उनकी छत ही थी। उज्जैन के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र और न्याय की जीत बताया है।
