गृहस्थ आश्रम को बताया कठिन तपस्या, भव्य शोभायात्रा के साथ भागवत कथा की हुई पूर्णाहुति

नलखेड़ा, अग्निपथ। गृहस्थ आश्रम मानव के लिए एक तपस्या के समान है, जहाँ रहकर उसे सबसे कठिन तप करते हुए अपने जीवन की नैया पार लगानी होती है। यही वह समय है जब कर्म के मार्ग पर चलने की बजाय मनुष्य के मन में भटकाव की स्थिति अधिक उत्पन्न होती है।

यह प्रेरक विचार नीम ग्राउंड में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिन बुधवार को कथावाचक पंडित चतुर्भुज चतुर्वेदी ने व्यक्त किए। उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि कर्म पथ पर चलते हुए घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों को संभालना कठिन जरूर है, लेकिन वास्तविक आत्मिक शांति इसी के माध्यम से प्राप्त होती है।

कथा के गूढ़ रहस्य को समझाते हुए पंडित चतुर्वेदी ने कहा कि केवल कथा सुनकर आनंद लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कथा के सार को अपने जीवन में उतारकर जीवन को आनंदित करना ही वास्तविक सार्थकता है। सात दिवसीय इस आध्यात्मिक महोत्सव की पूर्णाहुति के अवसर पर कथा स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

इस विशेष अवसर पर भागवत सेवा समिति के सदस्यों द्वारा व्यास पीठ का विधि-विधान से पूजन किया गया और कथावाचक पंडित चतुर्वेदी का सरोपा बांधकर आत्मीय सम्मान किया गया।

कथा के समापन के पश्चात पंडित चतुर्वेदी और श्रीमद् भागवत माता की एक भव्य शोभायात्रा गाजे-बाजे के साथ निकाली गई। यह शोभायात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से भक्तिमय माहौल में गुजरी, जहाँ जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर भागवत मैया और पंडित जी का अभिनंदन किया। शोभायात्रा का समापन स्थानीय चौक बाजार स्थित श्री गुप्तेश्वर महादेव मंदिर पर हुआ, जहाँ भक्तों ने पंडित जी से आशीर्वाद प्राप्त कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

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