मैसेज भेजकर छुट्टी वाले दिन बुलाने के बाद भी शुरू नहीं की नीलामी
धार, अग्निपथ। कृषि उपज मंडी में शुक्रवार को व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ती नजर आईं। अपनी गाढ़ी कमाई और खून-पसीने की उपज लेकर मंडी पहुंचे सैकड़ों किसानों को जब व्यापारियों की मनमानी के कारण बैरंग लौटना पड़ा, तो उनका धैर्य जवाब दे गया। मंडी प्रशासन की वादाखिलाफी और व्यापारियों के अडिय़ल रवैये से आक्रोशित किसानों ने छत्री चौराहे पर डेरा डाल दिया। किसानों के इस उग्र प्रदर्शन के कारण मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया और चक्काजाम की स्थिति निर्मित हो गई। चारों ओर व्यवस्था के नाम पर केवल अराजकता ही दिखाई दे रही थी।
प्रशासन के झूठे दावों की खुली पोल
इस पूरे विवाद की जड़ में मंडी प्रशासन का वह गैर-जिम्मेदाराना रवैया है, जिसने किसानों को छलावा दिया। दरअसल, बेमौसम बारिश के साये और आगामी लंबी छुट्टियों को देखते हुए मंडी प्रबंधन ने पूर्व में व्यापारी, हम्माल और तुलावटियों के साथ बैठक कर यह निर्णय लिया था कि 3 अप्रैल को गुड फ्राइडे के शासकीय अवकाश के बाद भी मंडी में नीलामी सुचारू रूप से चलेगी। मंडी प्रशासन ने इस संबंध में बाकायदा किसानों को मोबाइल पर संदेश भेजकर अपनी उपज लाने का आह्वान किया था।
प्रशासन के इसी भरोसे पर दूर-दराज के क्षेत्रों से किसान अपनी उपज लेकर सुबह-सुबह मंडी प्रांगण पहुंच गए थे। लेकिन वहां का नजारा कुछ और ही था। जिन व्यापारियों और हम्मालों ने काम करने का आश्वासन दिया था, उन्होंने ऐन वक्त पर काम करने से साफ इनकार कर दिया। किसानों ने घंटों इंतजार किया कि शायद व्यवस्था सुधरेगी और उनकी फसल की बोली लगेगी, लेकिन दोपहर तक जब कोई हलचल नहीं हुई तो किसानों का आक्रोश फूट पड़ा।
अधिकारियों की समझाइश रही बेअसर
जब स्थिति बेकाबू होने लगी और किसानों ने सडक़ पर बैठकर नारेबाजी शुरू कर दी, तो कोतवाली थाना प्रभारी दीपक सिंह चौहान दल-बल के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने किसानों को समझाने और धरना समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन किसानों का स्पष्ट कहना था कि जब तक नीलामी की प्रक्रिया विधिवत शुरू नहीं होती, वे वहां से नहीं हटेंगे। किसानों का आरोप है कि मंडी सचिव ने व्यापारियों को मनाने का दिखावा तो किया, लेकिन धरातल पर कोई ठोस समाधान निकालने में विफल रहे।
किसानों के अनुसार दोपहर होते-होते कई व्यापारी मंडी से जा चुके थे। ऐसे में अगर कम व्यापारियों के बीच नीलामी प्रक्रिया शुरू भी की जाती, तो प्रतिस्पर्धा कम होने के कारण किसानों को अपनी उपज के सही दाम नहीं मिलते। किसानों को डर था कि व्यापारियों की साठगांठ के चलते उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा। पिछले कुछ दिनों से मौसम के अनिश्चित मिजाज ने किसानों की चिंता पहले ही बढ़ा रखी है।
खुले आसमान के नीचे रखी फसल के खराब होने का डर उन्हें सता रहा है, लेकिन मंडी की इस अव्यवस्था ने उनकी मुसीबतों को दोगुना कर दिया है। प्रशासन की इस लापरवाही ने एक बार फिर किसानों को सडक़ पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।
