उज्जैन, अग्निपथ। जिले में इस बार गेहूं की कटाई के बाद बचने वाले अवशेष यानी नरवाई (पराली) के प्रबंधन के लिए कृषि कल्याण विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारी पूरी तरह मुस्तैद हैं। प्रशासन की ओर से लगातार बैठकें आयोजित कर हार्वेस्टर संचालकों और किसानों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि फसल कटाई के दौरान कंबाइन हार्वेस्टर के साथ ‘स्ट्रॉ रीपर’ का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाए। इससे खेतों में नरवाई नहीं बचेगी और भूसा बनने से किसानों को अतिरिक्त लाभ भी होगा।
अफसरों के दावों के बीच 15 फीसदी कटाई पूरी
प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि इस बार जिले में नरवाई जलाने की घटनाएं नहीं होंगी। हालांकि, इन तमाम प्रयासों और दावों के बीच जिले में अब तक करीब 15 फीसदी गेहूं की कटाई पूरी हो चुकी है। चिंता की बात यह है कि शुरुआती कटाई में स्ट्रॉ रीपर का उपयोग कम होने से फिलहाल कई खेतों में नरवाई पड़ी हुई है। कृषि विभाग अब इन क्षेत्रों पर विशेष नजर रख रहा है।
5.02 लाख हेक्टेयर में बुआई, पिछले साल 20 किसानों पर हुआ था जुर्माना
जिले में इस बार 5 लाख 2 हजार हेक्टेयर रकबे में गेहूं की बुआई की गई है। वर्तमान में उन खेतों में कटाई चल रही है जहाँ पहले चरण में बोनी हुई थी, जबकि अधिकांश फसल अभी खेतों में खड़ी है। विभाग की सख्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष नरवाई जलाने वाले करीब 20 किसानों से अर्थदंड वसूलने की कार्रवाई की गई थी। इस बार भी यदि नरवाई जलाने की घटना सामने आती है, तो हार्वेस्टर संचालक और किसान दोनों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
मिट्टी की सेहत और पर्यावरण के लिए घातक है नरवाई जलाना
किसान समय और श्रम बचाने के चक्कर में नरवाई जला देते हैं, लेकिन यह बेहद नुकसानदायक है। नरवाई जलाने से खेत की उर्वरक क्षमता कम हो जाती है और मिट्टी के भीतर मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीव, केंचुए व पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे जमीन बंजर होने लगती है। इसके साथ ही निकलने वाला धुआं पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुँचाता है।
इनका कहना है
फसल कटाई के बाद यदि खेतों में नरवाई बची हुई दिख रही है, तो उसका प्रबंधन किसान को स्वयं करना होगा। यदि कोई नरवाई जलाता है, तो सैटेलाइट के माध्यम से हमें तुरंत इसकी सूचना मिल जाएगी और संबंधित के खिलाफ तत्काल कड़ी कार्रवाई की जाएगी। – यू.एस. तोमर, उप संचालक कृषि कल्याण विभाग
