खरगोन, अग्निपथ। जुलवानिया रोड स्थित सहकारी क्षेत्र की गौरवशाली संस्था ‘जहरलाल नेहरू सूत मिल’ के अचानक बंद होने के पीछे क्या कोई गहरा वित्तीय कुचक्र है? पिछले 37 वर्षों से 500 से अधिक परिवारों की रोजी-रोटी का आधार रही इस मिल को नवंबर 2023 में ‘घाटे’ का हवाला देकर बंद कर दिया गया, लेकिन मिल के अपने ही ऑडिट और साधारण सभा के आंकड़े इस कहानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
लाभ से अचानक महा-घाटे तक का रहस्यमयी सफर
मिल के संचालक मंडल द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो एक चौंकाने वाली तस्वीर उभरती है। वर्ष 2020-21 में मिल ने 4 करोड़ 29 लाख रुपये का लाभ कमाया। अगले वर्ष 2021-22 में यह मुनाफा बढ़कर 5 करोड़ 54 लाख रुपये हो गया। लेकिन, अचानक वर्ष 2022-23 में 12 करोड़ 46 लाख रुपये की भारी-भरकम हानि दिखा दी गई। सवाल यह है कि जो मिल लगातार दो साल मुनाफे में थी, वह अचानक 15 करोड़ के घाटे के गर्त में कैसे चली गई? उत्पादन बंद होने के बाद भी घाटा 2 करोड़ रुपये और कैसे बढ़ गया?
शुगर मिल को ‘दान’ और कागजी मुनाफा
जांच में एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। सहकारिता विभाग के वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक बसंत यादव के अनुसार, सूत मिल का पैसा घाटे में चल रही शुगर मिल को उबारने के लिए डाइवर्ट किया जाता था। सूत मिल अपनी बैलेंस शीट में इस राशि पर ब्याज जोड़कर ‘कागजी लाभ’ दिखाती रही, जबकि हकीकत में यह पैसा मिल को कभी मिला ही नहीं। इस वित्तीय हेरफेर ने सूत मिल की कमर तोड़ दी।
किसानों के लाभांश पर किसका ‘पहरा’?
जांच के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि वर्ष 2006-07 से 2008-09 के बीच, जब सुभाष यादव मिल के अध्यक्ष थे, तब अंशधारियों को 500 रुपये प्रति वर्ष बोनस देने का प्रस्ताव पारित हुआ था। लेकिन पंजीयक सहकारी संस्थाएं भोपाल से अनुमति न मिलने का बहाना बनाकर किसानों को उनके हक से वंचित रखा गया। विडंबना देखिए कि जहां मिल के रिकॉर्ड 2021 तक लाभ दिखा रहे हैं, वहीं जांचकर्ताओं ने किसानों की शिकायतों को दरकिनार करते हुए वर्ष 2014-15 से 2024-25 तक लगातार 10 वर्षों तक मिल को घाटे में बता दिया है।
क्या बंद करने की रची गई साजिश?
साधारण सभा में जिस मिल के पांचवीं बार आधुनिकीकरण का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था, उसे अचानक बंद कर देना किसी बड़े कुचक्र की ओर इशारा करता है। संस्था के द्वारा प्रस्तुत वास्तविक आंकड़ों को अनदेखा कर मिल को लगातार घाटे में दिखाना उन 500 परिवारों के साथ क्रूर मजाक है जो आज सड़क पर आ गए हैं। क्या यह सहकारी संस्था को किसी निजी स्वार्थ के लिए बलि चढ़ाने की तैयारी है?
इनका कहना है: “घाटे में चल रही शुगर मिल को उबारने के लिए सूत मिल द्वारा धन उपलब्ध करवाया जाता था। बैलेंस शीट में इस राशि पर ब्याज जोड़कर लाभ दिखाया गया, जो राशि सूत मिल को कभी प्राप्त ही नहीं हुई।” — बसंत यादव, वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक, जांच अधिकारी
