बड़नगर, अग्निपथ। नियति का खेल बड़ा ही क्रूर होता है। बड़नगर के ग्राम झलारिया में बीते 24 घंटों से चल रही सांसे और संघर्ष की जंग आखिरकार मातम में बदल गई। बोरवेल में फंसे 3 वर्षीय मासूम भागीरथ को बचाने के लिए प्रशासन, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और ग्रामीणों ने दिन-रात एक कर ‘भागीरथी’ प्रयास किए, लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। शुक्रवार शाम करीब 6:30 बजे जब भागीरथ को बोरवेल की गहराई से बाहर निकाला गया, तो उसकी सांसें थम चुकी थीं। जिस मासूम की किलकारियों से घर आंगन गूंजता था, उसका निष्प्राण शरीर देख हर किसी की आंखें नम हो गईं।
मां की आंखों के सामने अंधेरे में समा गया बचपन
घटना गुरुवार शाम करीब 7 बजे की है, जब झलारिया ग्राम में रहने वाले प्रवीण उर्फ पसाराम देवासी का मासूम बेटा भागीरथ खेत पर खेल रहा था। खेलते-खेलते वह अचानक वहां खुले पड़े एक बोरवेल के मुहाने तक पहुंच गया। इससे पहले कि वहां मौजूद उसकी मां कुछ समझ पाती या उसे पकड़ पाती, मासूम उसकी नजरों के सामने ही अंधेरे गड्ढे में समा गया। मां की चीख पुकार सुनकर आसपास के ग्रामीण दौड़े और तुरंत पुलिस व प्रशासन को सूचना दी गई। मासूम भागीरथ मूल रूप से राजस्थान के पाली जिले के ग्राम कुरना का रहने वाला था, जिसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी रही प्रशासन की पूरी ताकत
हादसे की खबर मिलते ही समूचा प्रशासनिक अमला हरकत में आ गया। विधायक जितेन्द्रसिंह पण्डया ने तुरंत अधिकारियों को मुस्तैदी के निर्देश दिए। जिलाधीश रोशन कुमार सिंह और पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा स्वयं मौके पर पहुंचे और पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन की कमान संभाली। उज्जैन और अन्य जिलों से एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की विशेषज्ञ टीमों को बुलाया गया। रातभर भारी मशीनों, जेसीबी और पोकलेन का शोर गूंजता रहा, जो भागीरथ को नई जिंदगी देने की उम्मीद में मिट्टी खोदती रहीं। सबकी केवल एक ही प्रार्थना थी कि किसी भी तरह मासूम को सकुशल बाहर निकाल लिया जाए।
पत्थर बनी चट्टानें और रेस्क्यू में आई बाधाएं
भागीरथ को बचाने के लिए बचाव दलों ने कई जतन किए। सबसे पहले रस्सी और कैमरे डालकर बच्चे की स्थिति का पता लगाने की कोशिश की गई। कोई उसे 60 फीट पर बता रहा था तो कोई 70 फीट पर। जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ी, जमीन के भीतर आई कठोर चट्टानों ने रेस्क्यू की राह रोक ली। इन चट्टानों को तोड़ने में काफी समय और मशक्कत लगी। खुदाई के समानांतर एक सुरंग तैयार की जा रही थी ताकि बच्चे तक सुरक्षित पहुंचा जा सके। लेकिन समय बीतने के साथ ही ऑक्सीजन और उम्मीद, दोनों कम होने लगी थीं। अंत में हेकड़ी तकनीक के माध्यम से जब उसे बाहर निकाला गया, तो वह जीवन की जंग हार चुका था।
फूट-फूट कर रोती मां
24 घंटे तक चले इस बचाव कार्य के दौरान घटनास्थल पर हजारों लोगों का तांता लगा रहा। कई लोग सेवा के लिए पहुंचे, तो कई केवल तमाशबीन बने रहे और वीडियो बनाते दिखे। इस बीच भागीरथ की मां का रो-रोकर बुरा हाल था। वह बार-बार बोरवेल की ओर देख रही थी, इस आस में कि उसका लाल अभी बोल पड़ेगा। जब एम्बुलेंस में मासूम का शव रखकर शासकीय हॉस्पिटल बड़नगर ले जाया गया, तो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा मुंह को आ गया। प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद भागीरथ का शव ही हाथ आया, जिसने सुरक्षा इंतजामों और खुले बोरवेल की लापरवाही पर फिर से एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
