महाघोटाला: 500 परिवारों के निवाले पर भारी पड़ी ‘सियासी’ जिद, सूत मिल की बलि देकर शुगर मिल को किया गया ‘मालामाल’

खरगोन, (राजेश भावसार) अग्निपथ। खरगोन के औद्योगिक इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय लिखा जा चुका है, जिसने 500 से अधिक परिवारों के चूल्हे ठंडे कर दिए। शहर की लाइफलाइन कही जाने वाली ‘सूत मिल’ अचानक क्यों बंद हुई? जब इसकी परतों को उखाड़ा गया, तो सहकारिता के नाम पर किए गए एक ऐसे ‘वित्तीय खेल’ का खुलासा हुआ, जिसने लाभ में चल रही संस्था को कर्ज के दलदल में धकेल दिया।

सूत मिल का पैसा, शुगर मिल का ‘नशा’

सनसनीखेज तथ्य यह है कि सूत मिल को ढाल बनाकर कसरावद क्षेत्र में एक ऐसी शुगर मिल खड़ी की गई, जो अपनी स्थापना के समय से ही सफेद हाथी साबित हुई। वर्ष 1993 से 1998 के दौर में, जब तत्कालीन डिप्टी सीएम सुभाष यादव सूत मिल, शुगर मिल और अपेक्स बैंक तीनों के सर्वेसर्वा थे, तब सत्ता के रसूख का इस्तेमाल कर सूत मिल के नाम पर करोड़ों का फंड उठाया गया। शुगर मिल को चलाने के लिए पर्याप्त गन्ना तक उपलब्ध नहीं था, फिर भी वित्तीय संस्थानों से लोन न मिलने के बावजूद राज्य सरकार से 2745 लाख रुपये का मध्यकालीन ऋण झोंक दिया गया।

नियमों की धज्जियां: रिजर्व फंड में ‘सेंधमारी’

सहकारिता के नियमों को ताक पर रखने का खेल यहीं नहीं रुका। सितंबर 2022 की साधारण सभा में एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया जिसने कानून के जानकारों के होश उड़ा दिए। करीब 979.19 लाख रुपये ‘कंटीनजंट लायबिलिटी फंड’ के नाम पर सूत मिल से निकालकर शुगर मिल के रिजर्व फंड में ट्रांसफर कर दिए गए। यह सीधा-सीधा सहकारिता नियमों का उल्लंघन और वित्तीय अनियमितता का बड़ा सबूत है।

घाटे की गर्त में डूबती शुगर मिल, सूत मिल पर 2850 लाख का बोझ

आंकड़े गवाह हैं कि शुगर मिल मौत की तरफ बढ़ रही थी, लेकिन उसे ‘वेंटिलेटर’ देने के लिए सूत मिल का गला घोंटा गया। वर्ष 2017 से 2021 के बीच शुगर मिल का घाटा 570 लाख से बढ़कर 1217 लाख रुपये तक पहुँच गया। इस डूबते जहाज को बचाने के लिए वर्ष 2019-20 में सूत मिल पर 11% ब्याज की दर से 2850 लाख रुपये का भारी-भरकम कर्ज लाद दिया गया।

किसानों का मोहभंग और भविष्य पर संकट

एक तरफ कृषि विभाग के आंकड़े चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि बड़वाह और कसरावद क्षेत्र के किसानों का गन्ने से मोहभंग हो रहा है, वहीं दूसरी ओर घाटे की पूर्ति के लिए सूत मिल के मुनाफे और उसकी साख को बेरहमी से कुचला गया। सवाल यह उठता है कि क्या एक सियासी सपने को जिंदा रखने के लिए 500 परिवारों के रोजगार की आहुति देना जायज था? लाभ में चल रही सूत मिल को शुगर मिल के घाटे की आग में झोंकने वाले असली गुनहगार अब भी पर्दे के पीछे हैं।

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