मुआवजे की विसंगति पर बिफरे विधायक, कलेक्ट्रेट की सीढ़ियों पर ही लगा दिया जनता का दरबार

उज्जैन-जावरा ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट के लिए अधिगृहीत जमीन की कम कीमतों पर विरोध, कलेक्टर ने बाहर आकर दिया आश्वासन

रतलाम। उज्जैन-जावरा ग्रीन फील्ड सड़क परियोजना के लिए अधिगृहीत की जा रही कृषि भूमि के मुआवजे को लेकर विवाद गहरा गया है। शनिवार को आलोट विधायक चिंतामणी मालवीय किसानों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर के बाहर न आने पर सीढ़ियों पर ही धरने पर बैठ गए। विधायक ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए चेतावनी दी कि यदि किसानों के हितों की अनदेखी हुई तो वे उग्र आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगे।

आलोट विधानसभा के 8 गांवों के किसानों को बाजार दर से बेहद कम मुआवजा मिलने का विरोध काफी समय से चल रहा है। प्रदर्शन के दौरान विधायक मालवीय ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में प्रशासन की गाइडलाइन के अनुसार मुआवजा मात्र 2.20 लाख से 2.50 लाख रुपये प्रति बीघा तय किया जा रहा है। जबकि दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर और आठ-लेन की निकटता के कारण इस क्षेत्र की जमीनों का वास्तविक बाजार मूल्य 80 लाख से 1.5 करोड़ रुपये प्रति बीघा तक पहुंच चुका है।

प्रशासनिक अधिकारियों ने विधायक को चर्चा के लिए चेंबर के भीतर बुलाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने दो-टूक मना कर दिया। मालवीय ने कहा कि कलेक्टर को खुद जनता के बीच आकर उनकी व्यथा सुननी चाहिए। विधायक ने प्रशासन को चेताते हुए कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन किसानों को बर्बाद कर सड़क बनाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि अभी हम केवल अपनी मांग रख रहे हैं, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर हमारा स्वर और अधिक तीखा हो सकता है।

करीब 15 मिनट तक चले हंगामे के बाद कलेक्टर मिशा सिंह को स्वयं चेंबर से बाहर निकलकर सीढ़ियों पर आना पड़ा। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की बात सुनी और बाद में प्रतिनिधिमंडल के साथ विस्तृत चर्चा की। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि प्रभावित 8 गांवों का एक समूह बनाकर अधिकतम संभव मुआवजे के लिए नए सिरे से अध्ययन कराया जाएगा।

किसानों की मांग है कि मुआवजे की गणना पुरानी गाइडलाइन के बजाय हालिया रजिस्ट्री और पड़ोसी विकसित गांवों के मानकों के आधार पर की जाए। प्रतिनिधिमंडल ने यह भी मांग रखी कि उज्जैन और इंदौर जिलों में भूमि अधिग्रहण के लिए जो नियम अपनाए जा रहे हैं, वही मापदंड रतलाम में भी लागू होने चाहिए। किसानों का तर्क है कि पिछले 11 वर्षों से सरकारी गाइडलाइन में उचित वृद्धि नहीं हुई है, इसलिए उसे आधार बनाना अन्यायपूर्ण है।

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