बदनावर, अग्निपथ। मध्य प्रदेश के व्यस्ततम मार्गों में शुमार लेबड़-जावरा और जावरा-नयागांव फोरलेन एक बार फिर अपनी बेतहाशा टोल वसूली को लेकर प्रदेशभर के गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है। इस मार्ग पर निर्माण लागत से कई गुना अधिक राशि वसूलने का गंभीर मुद्दा अब देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इंदौर हाईकोर्ट को निर्देशित किया है कि लागत से अधिक टोल वसूली के इस प्रकरण की सुनवाई आगामी तीन माह के भीतर पूरी की जाए। इस कानूनी कार्रवाई के दायरे में प्रदेश के तीन प्रमुख मार्ग शामिल हैं, जिनमें भोपाल-देवास रोड की भी गहन समीक्षा की जानी है।
निवेश से पांच गुना ज्यादा वसूली का चौंकाने वाला गणित
वर्ष 2008-09 के दौरान जब रियासतकालीन महू-नीमच टू-लेन मार्ग को दो हिस्सों में विभाजित कर फोरलेन का स्वरूप दिया गया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह मार्ग “कमाई का माध्यम” बन जाएगा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लेबड़ से जावरा तक के 124 किलोमीटर लंबे खंड के निर्माण पर 589 करोड़ रुपये का खर्च आया था। वहीं, जावरा से नयागांव तक के 127 किलोमीटर लंबे हिस्से के निर्माण में 426 करोड़ रुपये व्यय हुए थे। पूरी परियोजना की कुल लागत 1015 करोड़ रुपये थी।
हैरानी की बात यह है कि विधानसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक, लेबड़-जावरा खंड से अब तक 2376 करोड़ रुपये से अधिक का टोल वसूला जा चुका है, जो मूल लागत से लगभग 1787 करोड़ रुपये अधिक है। इसी तरह जावरा-नयागांव खंड से 2635 करोड़ रुपये की वसूली हुई है, जो लागत से 2209 करोड़ रुपये ज्यादा है। कुल मिलाकर 1015 करोड़ रुपये के निवेश वाली इस सड़क से जनता की जेब से अब तक करीब 5011 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं, जो परियोजना लागत से लगभग 3996 करोड़ रुपये अधिक है।
दिसंबर 2038 तक जारी रह सकता है वसूली का खेल
जनता और जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार विरोध किए जाने के बावजूद, वर्तमान अनुबंध की शर्तें टोल कंपनियों के पक्ष में दिखाई दे रही हैं। यदि वर्तमान व्यवस्था बनी रहती है, तो इस मार्ग पर टोल वसूली दिसंबर 2038 तक निर्बाध रूप से जारी रहने की संभावना है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में वसूली का यह आंकड़ा वर्तमान से कहीं अधिक ऊपर चला जाएगा, जबकि सड़क की मूल लागत सालों पहले ही पूरी हो चुकी है।
“मौत का फोरलेन”: दुर्घटनाओं और मौतों के डरावने आंकड़े
यह मार्ग केवल आर्थिक बोझ ही नहीं, बल्कि जानलेवा भी साबित हुआ है। विधानसभा में इस मार्ग को “मौत का फोरलेन” की संज्ञा तक दी जा चुकी है। लेबड़ से नयागांव तक के इस सफर में अब तक हजारों परिवार उजड़ चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लेबड़-जावरा खंड पर 4,123 से अधिक दुर्घटनाओं में 2,225 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। वहीं, जावरा-नयागांव खंड पर 3,696 दुर्घटनाओं में 1,281 लोगों की मौत हुई है। तकनीकी खामियों और सड़क की खराब स्थिति के बावजूद टोल वसूली में कोई रियायत नहीं दी गई, जिससे आम जनता और वाहन चालकों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
निगरानी समिति और कानूनी लड़ाई
मार्ग की तकनीकी खामियों और अनियमितताओं की जांच के लिए पूर्व में विधानसभा द्वारा एक निगरानी समिति का भी गठन किया गया था, जिसमें स्थानीय सांसदों और विधायकों को शामिल किया गया था। इस समिति ने मौके पर जाकर रिपोर्ट पेश की थी, जिसके बाद कुछ समय के लिए छो कलां और बिलपांक टोल प्लाजा पर वसूली बंद भी हुई थी, लेकिन सड़क सुधार के नाम पर इसे पुनः शुरू कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस बात की उम्मीद जगी है कि क्या जनता को इस “असीमित वसूली” से निजात मिल पाएगी।
लेबड़-नयागांव फोरलेन परियोजना का वित्तीय विवरण
| विवरण | लेबड़-जावरा (124 किमी) | जावरा-नयागांव (127 किमी) | कुल योग (251 किमी) |
| निर्माण लागत | 589 करोड़ रुपये | 426 करोड़ रुपये | 1015 करोड़ रुपये |
| कुल टोल वसूली | 2376 करोड़ रुपये | 2635 करोड़ रुपये | 5011 करोड़ रुपये |
| लागत से अधिक वसूली | 1787 करोड़ रुपये | 2209 करोड़ रुपये | 3996 करोड़ रुपये |
सड़क सुरक्षा और दुर्घटना का विवरण
कुल दुर्घटनाएं: 7,819 से अधिक
कुल मृत्यु: 3,506 से अधिक
प्रमुख टोल प्लाजा: छो कलां (बदनावर) और बिलपांक (रतलाम)
