उज्जैन, अग्निपथ। धर्म, संस्कृति और न्याय के प्रतीक महाराजा विक्रमादित्य की गौरवशाली परंपरा को जीवंत करने के लिए उज्जैन की पवित्र नगरी एक बार फिर सज-धज कर तैयार है। विक्रमोत्सव 2026 के अंतर्गत 19 मार्च का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज होने जा रहा है। इस दिन शाम 7 बजे मोक्षदायिनी शिप्रा के पावन तट पर ‘सृष्टि आरंभ दिवस-उज्जयिनी गौरव दिवस’ का भव्य आयोजन किया जाएगा। यह उत्सव न केवल भक्ति और अध्यात्म का संगम होगा, बल्कि आधुनिक तकनीक और कला के अद्भुत तालमेल से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देगा।
आस्था और तकनीक का अनूठा मिलन: महादेव नदी कथा और ड्रोन शो
शिप्रा तट पर होने वाला यह मुख्य कार्यक्रम आकर्षणों का केंद्र होगा। कार्यक्रम का शुभारंभ ‘महादेव नदी कथा’ की भव्य नृत्य-नाट्य प्रस्तुति से होगा। इसमें भगवान शिव और पतित पावनी शिप्रा नदी की महिमा को कलाकारों द्वारा मंच पर सजीव किया जाएगा। अध्यात्म के इस सफर के साथ-साथ आसमान में आधुनिकता का रंग भी बिखरेगा। विशाल ड्रोन शो और भव्य आतिशबाजी के माध्यम से उज्जैन के आकाश को रोशन किया जाएगा, जो नई पीढ़ी और पर्यटकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव होगा।
सुरों की महफिल: पार्श्वगायक विशाल मिश्रा की सुरीली शाम
संगीत प्रेमियों के लिए यह उत्सव किसी वरदान से कम नहीं है। देश के विख्यात पार्श्वगायक विशाल मिश्रा और उनकी टीम अपनी जादुई आवाज से शिप्रा तट पर सुरों की गंगा बहाएंगे। उनके लोकप्रिय गीतों और भजनों की प्रस्तुति इस गौरव दिवस को और भी यादगार बना देगी। संगीत की यह शाम उज्जयिनी के सांस्कृतिक वैभव को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान देने का प्रयास है।
सुबह 5:30 बजे से गूंजेगा ‘कोटि सूर्योपासना’ का मंत्र
उत्सव की शुरुआत सूर्य की पहली किरण के साथ ही हो जाएगी। सुबह 5:30 बजे रामघाट और दत्त अखाड़ा क्षेत्र में ‘कोटि सूर्योपासना’ का भव्य आयोजन होगा। नवसंवत्सर अभिनंदन समारोह समिति और विभिन्न ज्योतिष अकादमियों के सहयोग से होने वाला यह कार्यक्रम इस वर्ष प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर सामूहिक रूप से आयोजित किया जा रहा है। साथ ही, ब्रह्म ध्वजा की स्थापना के साथ भारतीय नववर्ष का स्वागत किया जाएगा।
महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ की अनूठी पहल
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महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ और मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित यह उत्सव 21 फरवरी से 30 जून 2026 तक की विस्तृत अवधि में मनाया जा रहा है। शोध पीठ के निदेशक श्रीराम तिवारी के अनुसार, उत्सव को दो चरणों में बांटा गया है।
प्रथम चरण (21 फरवरी से 19 मार्च): इस दौरान व्याख्यानमाला, पारंपरिक ज्ञान पर आधारित आयोजन और विक्रम व्यापार मेले के जरिए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दिया गया।
द्वितीय चरण (जल गंगा संवर्धन): 19 मार्च से शुरू होने वाले इस चरण में जल संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और किसान कल्याण पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसमें प्राकृतिक खेती और ग्रामीण विकास से जुड़ी पहलों को जन-जन तक पहुंचाया जाएगा।
1 करोड़ रुपये का ‘सम्राट विक्रमादित्य अलंकरण’
इस वर्ष विक्रमोत्सव में प्रतिभाओं के सम्मान का दायरा बेहद विशाल रखा गया है। ‘सम्राट विक्रमादित्य अलंकरण 2026’ के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तित्व या संस्था को 1 करोड़ 1 लाख रुपये की सम्मान राशि प्रदान की जाएगी। इसके अतिरिक्त, राज्य स्तर पर तीन ‘शिखर सम्मान’ दिए जाएंगे, जिनमें से प्रत्येक के लिए 5 लाख रुपये की राशि निर्धारित है। यह सम्मान न्याय, सुशासन और लोक कल्याण के क्षेत्र में महाराजा विक्रमादित्य के आदर्शों को स्थापित करने वालों को दिया जाएगा। आवेदन की अंतिम तिथि 20 मई 2026 तय की गई है।
गरिमामय उपस्थिति: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव होंगे मुख्य अतिथि
इस भव्य समारोह के मुख्य अतिथि मध्य प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव होंगे। कार्यक्रम में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र सिंह लोधी, प्रभारी मंत्री, कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री गौतम टेटवाल, उज्जैन सांसद अनिल फिरोजिया, राज्यसभा सांसद बालयोगी उमेशनाथ महाराज, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा, महापौर मुकेश टटवाल और नगर निगम अध्यक्ष श्रीमती कलावती यादव की विशेष गरिमामय उपस्थिति रहेगी।
महत्वपूर्ण प्रकाशनों का होगा लोकार्पण
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ-साथ बौद्धिक संपदा का भी विस्तार किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान विक्रम पंचांग 2083, भारत निधि (मोनोग्राफ), आर्ष भारत, 84 महादेव और विक्रमांक (पत्रिका) जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का लोकार्पण किया जाएगा। यह प्रकाशन आने वाली पीढ़ियों के लिए उज्जैन के इतिहास और धार्मिक महत्व को समझने का एक सशक्त माध्यम बनेंगे।
शिप्रा के तट पर होने वाला यह आयोजन केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि हर उज्जयिनी वासी के लिए गर्व का क्षण है। प्रशासन ने सभी नागरिकों से अपील की है कि वे इस गौरवशाली परंपरा का हिस्सा बनें और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ें।
