वेदविद्या प्रतिष्ठान के सचिव की नियुक्ति पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख: मांगा जवाब

उज्जैन, अग्निपथ। महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान एक बार फिर विवादों के घेरे में है। हाल ही में एक छात्र की छड़ी से बेरहमी से पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद संस्थान की देश भर में किरकिरी हुई थी और अब प्रतिष्ठान के सचिव विरूपाक्ष जड्डीपाल की नियुक्ति को लेकर कानूनी तलवार लटक गई है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने इस मामले में दायर एक याचिका पर संज्ञान लेते हुए बेहद सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने प्रतिष्ठान के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और स्वयं सचिव विरूपाक्ष जड्डीपाल सहित अन्य संबंधित पक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय निर्धारित किया है।

नियुक्ति की वैधता पर उठे गंभीर सवाल

वेद शिक्षक स्वप्निल पाठक द्वारा इंदौर हाईकोर्ट में दायर रिट याचिका में सचिव जड्डीपाल की नियुक्ति को पूरी तरह से अवैध और नियम विरुद्ध बताया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रही एडवोकेट गार्गी पाठक ने बताया कि यह याचिका 9 जनवरी 2026 को दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2017 में जब विरूपाक्ष जड्डीपाल को उज्जैन स्थित इस प्रतिष्ठित संस्थान में सचिव के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया था, तब निर्धारित मापदंडों और भर्ती नियमों की घोर अनदेखी की गई थी। सूचना के अधिकार के तहत शिक्षा मंत्रालय और प्रतिष्ठान से नियमों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन संतोषजनक उत्तर न मिलने पर किए गए स्वतंत्र शोध में नियुक्ति प्रक्रिया में बड़ी विसंगतियां सामने आई हैं।

योग्यता और पद को लेकर तकनीकी पेंच

कानूनी दलीलों के अनुसार, प्रतिष्ठान के सचिव पद पर नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी का किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होना अनिवार्य है। याचिका में दावा किया गया है कि जड्डीपाल की नियुक्ति के समय वे तिरुपति स्थित राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठम में मात्र एक एसोसिएट प्रोफेसर थे, जो कि एक डीम्ड विश्वविद्यालय है न कि पूर्ण केंद्रीय विश्वविद्यालय। यह पद श्रेणी ‘ए’ के सार्वजनिक अधिकारी का है, जिस पर एक गैर-सार्वजनिक अधिकारी को बिठाना नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।

प्रतिनियुक्ति विस्तार में नियमों की अनदेखी

याचिका में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि डॉ. जड्डीपाल की प्रारंभिक प्रतिनियुक्ति वर्ष 2022 में ही समाप्त हो चुकी थी। नियमानुसार उन्हें उनके मूल संगठन वापस भेजा जाना चाहिए था, लेकिन वे बिना किसी पूर्व स्वीकृति के पद पर बने रहे। बाद में जून 2023 में मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति द्वारा उनकी प्रतिनियुक्ति को 10 जुलाई 2024 से अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि प्रतिष्ठान के ज्ञापन के नियम 19 में हेरफेर कर यह विस्तार दिया गया है, जबकि भारत सरकार के सामान्य नियमों के तहत प्रतिनियुक्ति की अवधि सात वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती।

प्रशासनिक अनियमितताओं और उत्पीड़न के आरोप

सिर्फ नियुक्ति ही नहीं, बल्कि डॉ. जड्डीपाल के कार्यकाल के दौरान किए गए प्रशासनिक कार्यों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं। याचिका में आरोप है कि सचिव के रूप में अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने भारी भर्ती अनियमितताएं की हैं और संस्थान के मूल उद्देश्यों को नुकसान पहुंचाया है। वैदिक विद्वानों और विभिन्न वेद पाठशालाओं के उत्पीड़न के मामले भी सामने आए हैं, जिसे जन नीति के विरुद्ध बताया गया है। इन्हीं आधारों पर याचिकाकर्ता ने उन्हें तत्काल पद से हटाने की मांग की है, जिस पर अब उच्च न्यायालय छह सप्ताह बाद अगली सुनवाई करेगा।

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