पसीने में लथपथ थे बच्चे, कार्रवाई के डर से शटर बंद रखता था संचालक
इंदौर, अग्निपथ। चाइल्ड लाइन ने लसूडिय़ा क्षेत्र में एक चॉकलेट फैक्ट्री में काम कर रहे सभी 10 बच्चों से अमानवीयता से काम लिया जा रहा था। सभी बच्चे पसीने में लथपथ काम कर रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक भट्टी के बीच काम कर रहे बच्चों के लिए वेंटिलेटर था न एसी-कूलर। ये सभी बच्चे 30 रुपए प्रति घंटे में काम कर रहे थे। बच्चों के कारण उनके माता-पिता फैक्ट्री संचालक के बचाव में उतर आए हैं। फैक्ट्री में ब्रांडेड चॉकलेट की डुप्लिकेट भी पैक हो रही थी। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।
बच्चों के माता-पिता का दावा है कि ये सभी बच्चे स्कूल जाते हैं। छुट्टियों के कारण वे बच्चों को काम सीखने के लिए फैक्ट्री में भेज रहे थे। लेकिन फैक्ट्री के हालात पर सवाल-जवाब करने पर वे चुप्पी साध गए।कार्रवाई करने गए महिला एवं बाल विकास विभाग, श्रम विभाग, चाइल्ड लाइन और पुलिसकर्मियों ने बताया कि फैक्ट्री संचालक को यह पता है कि बच्चों से काम लेना अपराध है। इसलिए वह पूरे समय परिसर का शटर बंद रखता था।
10 बच्चों को छुड़ाया है। सूचना मिली थी कि यहां मासूमों से दिनभर काम लिया जाता है। इस पर चाइल्ड लाइन, श्रम विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग व पुलिस इन चारों विभागों की टीम ने गुरुवार रात को दबिश दी तो यहां 10 बच्चे काम करते हुए मिले। फैक्ट्री में मशीन चलने काफी गर्मी रहती थी और बच्चे पसीने में तर रहते थे। वेंटिलेशन नहीं होने से उन्हें घबराहट भी होती थी। इसके चलते बच्चों का मेडिकल भी कराया गया है।
यहां से मिले बच्चों में 4 बालक व 6 बच्चियां हैं। बच्चों को अलग-अलग समय पर काम करने बुलाया जाता है और ये बच्चे इसी क्षेत्र व आसपास के हैं। पता चला कि कुछ बच्चों को दिन में तो कुछ को दूसरी शिफ्ट में बुलवाया जाता है। इन बच्चों में 13 से 17 साल के बच्चे शामिल हैं। यह पता लगने के बाद चारों विभागों ने कैलोद हाला के एसडीए कंपाउंड स्थित आईओ वेंचर्स प्रालि चॉकलेट फैक्ट्री पर कार्रवाई की।
टीम को देखते ही सभी हरकत में
रात को संस्था आस व कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन की जानकारी के बाद चाइल्ड लाइन डायरेक्टर वसीम इकबाल, बचपन बचाओ आंदोलन के सलमान, महिला बाल विकास विभाग के आशीष वर्मा, श्रम विभाग के रवींद्र ठाकुर, तृप्ति डावर, कुलदीप, विशेष किशोर पुलिस इकाई से कुसुम बास्कले, राजकुमार खण्डेलवाल, रामेश्वर चौधरी पुलिस टीम के साथ फैक्ट्री में पहुंचे।
इन्होंने बताया कि अंदर एक हॉल में ये बच्चे नीचे बैठकर मशीन से पैक्ड की हुई चॉकलेट्स को अलग-अलग बॉक्स में पैक कर रहे थे। पास ही में प्लास्टिक की बहुत सारी ट्रे रखी थी जिसमें उन्हें रखा जा रहा था। मौके पर सात महिलाएं काम करती मिली जबकि तीन लडक़े भी थे। इनमें एक महिला सुपरवाइजऱ भी थी।
एक घंटे के 30 रुपए के लिए कर रहे थे काम
इस दौरान कुछेक महिलाओं ने कहा कि बच्चों से कोई बाल श्रम नहीं कराया जा रहा है। ये सारे परिचित परिवारों के ही बच्चे हैं। इनके माता-पिता की सहमति के बाद ही इन्हें भेजा गया है। टीम ने दो बच्चों से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्हें काम करने के 30 रु. प्रति घंटा मिलते थे और चार घंटे के 130 रु. मिलते थे। वे शाम को यहां आते थे।