पुरखों की सरजमीं को चूमने का मिला एक और मौका

अर्जुन सिंह चंदेल

कहा जाता है कि पेड़ यदि अपनी जमीन छोड़ देता है तो उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाता है, ठीक उसी तरह मनुष्य को भी अपनी जमीन नहीं छोडऩी चाहिये। इसी ब्रह्मवाक्य को आत्मसात करते हुए हम भी अपने अतीत को कभी विस्मृत नहीं करते और अपने पुरखों की जन्मस्थली पर जाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते।

बीते सप्ताह लखनऊ में मामा के बेटे के यहाँ उसके पुत्र के विवाह समारोह में शिरकत करने का न्यौता मिला, फिर क्या था हमने अवसर को लपक लिया। सडक़ मार्ग से भाइयों और भाभियों सहित लंबी यात्रा का लुत्फ भी मिल गया और पहुँच गये नवाबों के शहर लखनऊ।

वर्षों बाद मामा परिवार के भूले-बिसरों से मुलाकात हुयी। मामा की बेटियों यानि हमारी बहनों और उनके प्यारे बच्चों से मुलाकात हुयी जिनमें से कुछ स्वयं माता-पिता बन चुके थे। कुछ चेहरे अनजान थे मेरे लिये, नहीं पहचान पाया। 12 वर्षों बाद लखनऊ की यात्रा जो हुयी थी।

खैर, मुझे सुखद आश्चर्य तब हुआ जब मैंने सोश्यल मीडिया का अल्कपनीय प्रभाव देखा और मैंने सोश्यल मीडिया के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और नतमस्तक हो गया।

कारण था कि नयी पीढ़ी के बच्चे और उनके माता-पिता अर्थात मेरे मामा की बेटियों की बेटियों ने बताया कि हम तो आपको पहचानते हैं। मैंने अवाक होकर पूछा कैसे? मैं तो आप लोगों से कभी मिला भी नहीं।

तब उन्होंने बताया कि हम लोग आपके फेसबुक फ्रेंड (दोस्त) हैं। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ और मैंने परमपिता परमेश्वर को इस उपकार के लिये धन्यवाद दिया कि चलायमान फोन ने विज्ञान के माध्यम से प्यार और स्नेह की पतली ही सही परंतु मजबूत अदृश्य डोर से अपनों के साथ बाँध तो रखा है। भले ही मैं नहीं पहचान पाया परंतु मेरे अपने मुझे पढ़ते और देखते भी हैं।

लखनऊ से ही 170 किलोमीटर बारात गयी थी। वधु पक्ष का गाँव अयोध्या से मात्र 40-50 किलोमीटर ही दूर था। सज धज कर ठाठ-बाट से बाराती बनकर गये और गाँव की वैवाहिक परम्पराओं का आनंद लिया। दूसरे दिन अवसर मिला पिता जी की जन्मस्थली चंदेल नगर जाने का जो लखनऊ से 90 किलोमीटर की दूरी पर रायबरेली मार्ग पर स्थित है।

पूरा परिवार निकल पड़ा महामानव, तपस्वी, पत्रकारिता के पुरोधा, हमारे जन्मदाता के पवित्र स्थान के एक बार और दर्शनों हेतु। जैसे-जैसे चंदेलनगर निकट आता जा रहा था वैसे-वैसे खुशियां कुलाचें मार रहीं थी। मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू अपना असर हम लोगों के शरीर पर दिखाने लग गयी थी।

कभी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी का निर्वाचित क्षेत्र रहा हमारा पैतृक गाँव का बोर्ड हमें नजर आने लगा था। गाँव बहुत छोटा-सा है। मात्र 100-150 की आबादी वाले चंदेल नगर के अधिकांश नवयुवक जीवकोपार्जन के लिये बड़े शहरों में चले गये हैं। गाँव में बुजुर्ग और महिलाएं ही रहती हैं।

कभी हमारे पिता और परपिता का जीवन जिस हवेली और कोठी में बीता होगा वह अब वीरान है। खूब बड़े और विशाल भूखंड पर बनी हवेली के संधारण का दायित्व ना चाहते हुए भी काका के कनिष्ठ पुत्र ने संभाल रखा है जिनके तीनों पुत्र देश की राजधानी दिल्ली में कार्यरत हैं। भाई और भाभी उस विरासत को बचाये रखने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। अपनों से मिलकर जो खुशी होती है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है।

चंदेल नगर की पवित्र और ऐतिहासिक ‘रज’ को बार-बार चूमने का मन कर रहा था। रोम-रोम रोमांचित हो रहा था यह कल्पना करके कि इसी पवित्र भूमि पर हमारे पूज्य पिताजी ने अपनी बाल्यावस्था गुजारी है और इसी धरती का पुण्य प्रताप है जिसने उन्हें एक सच्चा कर्मयोगी बनाया और हम उसकी संतान है।

पुरखों की इस धरती को नमन करके आँखे भर आयी। नदी की बालू से भरे खेत, हिरणों, नीलगायों, जंगली सुअरों के आंतक से चंदेल नगर के किसान हलाकान है। फसलों का उत्पादन सिर्फ इतना ही होता है जिससे उदर पोषण हो जाए इससे ज्यादा नहीं।

चंदेल नगर में 8 घंटे कब गुजर गये पता ही नहीं चला ऐसा लगा समय थम-सा गया है। बिदायी की बेला आ गयी थी क्योंकि अगले दिन अल सुबह हमें अपने घोंसले (उज्जैन) के लिये प्रस्थान जो करना था।

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