अर्जुन सिंह चंदेल
गतांक से आगे
बर्फबारी की सूचना हमारे अरमानों पर पानी फेर सकती थी क्योंकि 14 जनवरी को हमें गंगटोक से 56 किलोमीटर दूर ‘नाथूला दर्रा’ और बाबा हरभजन सिंह का मंदिर देखने जाना था जो भारतीय सेना के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सिक्किम यात्रा में पर्यटकों का मुख्य आकर्षण नाथूला दर्रा ही है। समुद्र तल से 14 हजार 200 फीट ऊँचाई पर स्थित यह हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो सिक्किम और तिब्बत की चुम्बी घाटी को जोड़ता है। भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था।
भारत और चीन के बीच होने वाले व्यापार का 80 प्रतिशत हिस्सा नाथूला दर्रे के जरिये ही होता था। नाथूला दर्रे तक केवल भारतीय नागरिक ही जा सकते हैं इसके लिये भी गंगटोक से पार पत्र (अनुमति पास) बनवाना होता है जो भारतीय सेना बनाती है। गंगटोक घूमने के बाद देर शाम होटल आ गये।
हाँ एक बात बताना भूल गया था जयगाँव से गंगटोक आते समय फिल्म कलाकार डेनी डेन्जो गप्पा की बियर फेक्ट्री भी दूर से देखी थी। सिक्किम में अल्कोहल बहुत सस्ता है। बकार्डी रम की बोतल मात्र 450 रुपये में और डेनी की बियर मात्र 95 रुपये में। बियर का आनंद लिया गया जिसका स्वाद भी बेहतर था और सिक्किम में पदस्थ ‘सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चे’ की सरकार को धन्यवाद भी दिया।
पूरे सिक्किम में 32 में से 31 सीटों पर मोर्चे का ही कब्जा है, काँग्रेस और भाजपा का नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। सिक्किम के लोगों में ‘मोमो’ बहुत लोकप्रिय है इसके साथ ही ‘थुकपा’ (सब्जियों और गौमांस से बना नूडल सूप), ‘सीट-रोटी’ (चावल को पानी के साथ पीसकर पेस्ट) बनायी जाती है ज्यादा लोकप्रिय है साथ ही सरसों के पौधों की पत्तियों का ज्यूस ‘गुंडक’ पसंद किया जाता है।
मौसम तो बिगड़ ही चुका था 14 जनवरी का सारा प्रोग्राम अधर में हो चला था, कुछ तय नहीं था सुबह क्या सीन बनेगा, जबकि हम लोग नाथूला दर्रा के परमिट के लिये सारे कागजात दे चुके थे गाड़ी तय हो गयी थी। खैर होता वही है जो ईश्वर को मंजूर हो। उम्मीद की आस लिये कि सुबह मौसम अच्छा रहेगा होटल मेडालियों में ही रात्रि भोजन करके सो गये।
सुबह हुयी तो होटल के महाप्रबंधक राजेश भाई और उनके सहयोगी ने नाश्ते में शानदार पराठे और आलू की सब्जी बनवा दी जो लाजवाब थी। पर ‘रात वहीं हुयी जहाँ चोरों का डर था’। सुबह 9:30 पर मनहूस खबर आ गयी कि रात को नाथूला दर्र के पास हिमपात होने से रास्ता बंद कर दिया गया है। दिल के अरमां आसुओं में बह गये।
फिर समस्या सामने आ गयी कि आज यानि 14 जनवरी का दिन कहाँ बिताया जाय? यदि कल यानि 15 जनवरी की उम्मीद में गंगटोक रूक भी जाते तो यह ग्यारंटी नहीं थी कल भी मौसम नाथूला दर्रा जाने देगा या नहीं। 16 जनवरी की हमारी फ्लाईट थी दिन दो ही शेष थे। संकट मोचक राजेश भाई को फोन घुमाया, वह सज्जन आदमी खुद मौसम की बेरुखी से नाराज थे। कई विकल्पों पर विचार के बाद सभी साथियों ने यह तय कि गंगटोक तो छोड़ा जाय और दार्जिलिंग चला जाय ‘नामची’ होकर।
राजेश भाई ने ही नामची होते हुए दार्जिलिंग छोडऩे की गाड़ी, साथ ही वहाँ रूकने के लिये होटल, साईट सीन के लिये और दार्जिलिंग से 16 जनवरी को बागडोगरा एयरपोर्ट छोडऩे तक की सारी चाक चौबंद व्यवस्था जमा दी अब हम बेफ्रिक हो गये। अपने घर वापसी तक के सारे माकूल प्रबंध हो चुके थे। इंसानियत के फरिश्ते राजेश जी, जिनसे जीवन की पहली ही मुलाकात थी, उन्होंने हमारी सारी समस्याओं का समाधान चुटकी बजाते ही कर दिया। ‘राजेश भाई जिंदाबाद’ कहकर और फिर एक बार गंगटोक आने का वचन देकर हम निकल पड़े ‘नामची देखने’।
शेष कल