धार, अग्निपथ। धार की ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर भोजशाला एक बार फिर देश की सुर्खियों में है। आगामी 23 जनवरी को बसंत पंचमी का महापर्व है और इसी दिन शुक्रवार होने के कारण पूरा शहर पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका है। यह स्थिति भोजशाला से जुड़े उस सात दशक लंबे संघर्ष की याद दिलाती है, जो अयोध्या के बाद देश के सबसे प्रभावशाली आंदोलनों में गिना जाता है। करीब 74 वर्षों से हिंदू समाज यहाँ माँ वाग्देवी की प्रतिमा पुनः स्थापित करने और अखंड पूजा के अधिकार के लिए सतत आंदोलनरत है।
1952 से सुलगी आंदोलन की चिंगारी
भोजशाला में सामूहिक रूप से बसंत पंचमी उत्सव मनाने की परंपरा वर्ष 1952 में शुरू हुई थी। समय के साथ यह केवल धार्मिक आयोजन न रहकर सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बन गया। 1994 से 2003 के कालखंड में इस आंदोलन ने उग्र रूप धारण किया। भारी प्रशासनिक दबाव और लाठीचार्ज जैसी घटनाओं के बावजूद आंदोलनकारी पीछे नहीं हटे। संघर्ष का ही परिणाम था कि 2003 में भोजशाला के ताले खुले और हिंदू समाज को प्रत्येक मंगलवार पूजा का वैधानिक अधिकार प्राप्त हुआ।
महाराजा भोज की ज्ञानपीठ: वैभव और विध्वंस का इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार, इस भव्य इमारत का निर्माण 1034 ईस्वी में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने कराया था। यह उस दौर का एक विशाल आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ भाषा, साहित्य और संस्कृति का संगम होता था। महाराजा भोज ने स्वयं यहाँ 84 ग्रंथों की रचना की थी। गौरवशाली इतिहास के बीच 1305 से 1514 ईस्वी के दौरान अलाउद्दीन खिलजी, दिलावर खां गौरी और महमूद खिलजी द्वितीय के आक्रमणों ने इस ज्ञान के केंद्र को गहरी क्षति पहुँचाई।
ब्रिटिश काल: जब लंदन पहुँची माँ वाग्देवी की प्रतिमा
अंग्रेजों के शासनकाल में भोजशाला का पुरातात्विक सर्वे हुआ। खुदाई के दौरान यहाँ से माँ वाग्देवी (सरस्वती) की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा प्राप्त हुई थी। अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड इस ऐतिहासिक प्रतिमा को अपने साथ लंदन ले गए, जो आज भी ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है। वर्ष 1904 में अंग्रेजों ने इसे संरक्षित धरोहर घोषित किया था, लेकिन प्रतिमा की वापसी की मांग आज भी इस आंदोलन का मुख्य केंद्र है।
700 साल पुराना विवाद और 1997 की तालाबंदी
भोजशाला को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष के अपने-अपने दावे हैं। जहाँ हिंदू पक्ष इसे प्राचीन सरस्वती मंदिर मानता है, वहीं मुस्लिम समाज इसे कमाल मौलाना मस्जिद बताता है। विवाद तब चरम पर पहुँचा जब 12 मई 1997 को तत्कालीन कलेक्टर वीबी सुब्रह्मण्यम ने विवादित स्थिति को देखते हुए भोजशाला पर ताले लगवा दिए थे। इस तालाबंदी ने जनआक्रोश को भड़काया और एक बड़े जनआंदोलन की नींव रखी।
2003 का ऐतिहासिक आदेश और ‘शुक्रवार’ का पेंच
लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई के बाद 7 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक व्यवस्था दी। इसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति मिली। आदेश में बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा का अधिकार तो दिया गया, लेकिन जब-जब बसंत पंचमी शुक्रवार को आई, तब समय और स्थान को लेकर विवाद की स्थिति बनी। 700 साल पुराने इस विवाद में अब 22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं कि इस बार का बसंत उत्सव कैसा होगा।
