कागजों में सिमटी ग्राम रक्षा समितियां: पुलिस और जनता के बीच टूट रही भरोसे की कड़ी

कायथा,अग्निपथ। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस के “आंख और कान” कही जाने वाली ग्राम रक्षा समितियां वर्तमान में अपनी पहचान खोती जा रही हैं। कभी पुलिस और ग्रामीणों के बीच बेहतर समन्वय का सशक्त माध्यम रहीं ये समितियां आज केवल सरकारी कागजों तक सीमित होकर रह गई हैं। एक दौर था जब पुलिस बल की कमी को पूरा करने और गांव-गांव में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने के लिए इन समितियों का गठन बड़े उत्साह के साथ किया गया था, लेकिन देखरेख के अभाव में अब यह व्यवस्था दम तोड़ रही है।

सुरक्षा की मजबूत कड़ी अब हुई निष्क्रिय

इन समितियों के गठन के समय ग्रामीणों को बाकायदा सदस्य बनाकर उन्हें परिचय पत्र, टॉर्च और सुरक्षा संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए थे। उस समय सदस्य संदिग्ध गतिविधियों पर पैनी नजर रखते थे और किसी भी अप्रिय घटना की सूचना तत्काल पुलिस को देते थे। इससे न केवल अपराधों पर लगाम लगी थी, बल्कि पुलिस और आमजन के बीच भरोसे का एक मजबूत रिश्ता कायम हुआ था।

संवाद का अभाव और बढ़ती चुनौतियां

बीते लंबे समय से पुलिस प्रशासन और समिति सदस्यों के बीच न तो कोई नियमित बैठक हुई है और न ही कोई संवाद। परिणामस्वरूप, अधिकांश समितियां अब पूरी तरह निष्क्रिय हो चुकी हैं और सदस्य खुद को व्यवस्था से कटा हुआ महसूस कर रहे हैं। वर्तमान में जब ग्रामीण अंचलों में चोरी, लूट और असामाजिक गतिविधियों के मामले बढ़ रहे हैं, तब इन समितियों की अनुपस्थिति खलने लगी है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि वरिष्ठ अधिकारी इन समितियों को पुनः सक्रिय करें, तो अपराध नियंत्रण में बड़ी मदद मिल सकती है।

सामूहिक जिम्मेदारी की है आवश्यकता

ग्राम रक्षा समितियों का पुनर्जीवन न केवल कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करेगा, बल्कि समाज में सुरक्षा के प्रति एक सामूहिक जिम्मेदारी की भावना भी पैदा करेगा। प्रशासन और ग्रामीणों के संयुक्त प्रयासों से इस पुरानी और प्रभावी व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाया जा सकता है। आज के समय में जब पुलिस पर कार्यभार अधिक है, ऐसे में ग्राम रक्षा समितियां एक मददगार बल के रूप में साबित हो सकती हैं।

बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों से चर्चा कर ग्राम रक्षा समितियों को सक्रिय किया जाएगा। — राजकुमार मालवीय, टीआई, कायथा

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