अहमदाबाद, अग्निपथ। मकर संक्रांति के पर्व पर अहमदाबाद के आसमान में सिर्फ पतंगें ही नहीं, बल्कि उम्मीदों और व्यापार की ऊंची उड़ान भी देखने को मिल रही है। शहर के ऐतिहासिक ‘पोल’ इलाकों में इन दिनों ‘टेरेस टूरिज्म’ का जबरदस्त क्रेज है। आलम यह है कि शहर की सबसे ऊंची छतों को बुक करने के लिए लोग 20 हजार से लेकर 1.5 लाख रुपये तक खर्च कर रहे हैं। जितनी ऊंची छत और जितना शानदार नजारा, उतना ही भारी भरकम किराया वसूला जा रहा है।
अहमदाबाद के खाडिया, रायपुर और पोल इलाकों में पुरानी हवेलियों की छतें अब पर्यटन का नया केंद्र बन गई हैं। विदेशों में बसे गुजराती परिवार अपनी यादें ताजा करने के लिए हर साल यहां लौटते हैं। स्थानीय निवासी अजय मोदी ने बताया कि इस बार उनके घर की छत पंजाब से आए एक परिवार ने बुक की है। मकान मालिक मेहमानों को सिर्फ छत ही नहीं, बल्कि पतंगें, मांझा और गुजरात का प्रसिद्ध स्वाद भी परोस रहे हैं। खाने के मेन्यू में गरमा-गरम उंधियू-पूरी, जलेबी, भजिया और तिल की चिक्की शामिल है। मेहमानों की सुविधा के लिए छतों पर सोफे, कुर्सियां और आराम के लिए कमरे भी मुहैया कराए जा रहे हैं।
5,000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई
यह ट्रेंड न केवल मकान मालिकों के लिए बल्कि स्थानीय छोटे व्यापारियों के लिए भी खुशियां लेकर आता है। दो दिनों के इस उत्सव में पतंग-डोर बेचने वाले, नाश्ते के स्टॉल लगाने वाले और घरेलू उद्योग चलाने वाली महिलाएं 2,000 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर लेती हैं। जिग्नेशभाई रामी के अनुसार, पिछले 4-5 सालों में यह चलन काफी बढ़ा है। अब विदेशी पर्यटक भी होटलों के बजाय इन पुरानी हवेलियों की छतों को तरजीह देते हैं ताकि वे भारतीय संस्कृति और उत्सव के असली आनंद को करीब से महसूस कर सकें।
इस त्यौहार की चमक मध्यमवर्गीय और जरूरतमंद परिवारों के जीवन में भी उजाला ला रही है। गीताबेन राणा, जो स्वयं और उनका परिवार दिव्यांग है, बताती हैं कि वे हर साल अपनी छत पर्यटकों को किराए पर देती हैं। दिव्यांगता के कारण वे खाना तो उपलब्ध नहीं करा पातीं, लेकिन सिर्फ छत किराए पर देने से उन्हें 20 से 30 हजार रुपये की आर्थिक मदद मिल जाती है। शाम ढलते ही ये छतें आतिशबाजी से गुलजार हो जाती हैं, जिससे पुराने अहमदाबाद का नजारा किसी दिवाली जैसा मनमोहक दिखाई देता है।
