उज्जैन। शहर में सिंहस्थ 2028 की तैयारियां युद्ध स्तर पर जारी हैं, लेकिन इस विकास की भारी कीमत आम जनता को अपने आशियाने उजाड़ कर चुकानी पड़ रही है।
प्रशासनिक महकमा और स्थानीय जनप्रतिनिधि लगातार सड़कों पर उतरकर निरीक्षण कर रहे हैं। हालांकि, इन हाई-प्रोफाइल दौरों का मुख्य उद्देश्य जमीनी हकीकत समझना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर अपनी छवि चमकाने के लिए ‘रील’ बनाना नजर आ रहा है।
सड़क चौड़ीकरण की जद में आकर दर्जनों परिवार पूरी तरह से बेघर हो चुके हैं। प्रशासन ने उन परिवारों को तो आनन-फानन में सरकारी मल्टी में शिफ्ट कर दिया जिनके मकान पूरी तरह ढहा दिए गए थे।
वर्तमान में सबसे बड़ी परेशानी उन लोगों के सामने खड़ी है, जिनके आशियाने आंशिक रूप से प्रभावित हुए हैं। आधे टूटे और जर्जर अवस्था में पहुंच चुके इन मकानों में रहने को मजबूर परिवारों का मुआवजा प्रकरण फाइलों में धूल खा रहा है।
बारिश और खराब मौसम के बीच ये पीड़ित परिवार अपने घरों के मलबे पर तिरपाल तानकर दिन गुजारने को विवश हैं। प्रशासन की ओर से अब तक इन्हें किसी प्रकार की फौरी आर्थिक सहायता या वैकल्पिक आश्रय भी उपलब्ध नहीं कराया गया है।
एमआईसी की मंजूरी के बाद सदन की बैठक का इंतजार
प्रभावित परिवारों को आर्थिक राहत और मुआवजा देने का प्रस्ताव मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) से काफी पहले ही पास हो चुका है। तकनीकी रूप से अब इसे केवल नगर निगम के साधारण सम्मेलन यानी सदन की बैठक में हरी झंडी मिलना बाकी है।
विडंबना यह है कि महीनों बीत जाने के बाद भी अब तक सदन की बैठक आहुत नहीं की गई है। लोगों का कहना है कि यदि कोई अन्य व्यावसायिक मुद्दा होता या ठेकेदारों के भुगतान का मामला अटकता, तो विशेष सम्मेलन बुला लिया जाता।
मामला आम जनता और गरीब तबके से जुड़ा होने के कारण इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। प्रभावित लोग रोज नगर निगम मुख्यालय के चक्कर काटते हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ खोखला आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है।
अफसरों और जनप्रतिनिधियों में वर्चस्व की जंग
सिंहस्थ के इस महायज्ञ में अपना वर्चस्व और ताकत दिखाने की होड़ मची हुई है। आला प्रशासनिक अधिकारी रोज नए-नए निर्माण कार्यों और चौड़ीकरण वाले मार्गों का मुआयना करने दलबल के साथ पहुंच रहे हैं।
इनके साथ कैमरामैन की टीम चलती है, जो सोशल मीडिया के लिए आकर्षक रील तैयार करती है। इन वीडियो में विकास की गाथा तो गाई जाती है, लेकिन चौड़ीकरण से टूटे मकानों के सामने रोते-बिलखते परिवारों को फ्रेम से बाहर कर दिया जाता है।
हैरानी की बात यह है कि इन निरीक्षणों में प्रशासनिक अधिकारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों को पूरी तरह से दरकिनार कर रहे हैं। निर्माण कार्यों से जुड़ी अहम समीक्षा बैठकों और प्लानिंग में भी चुने हुए पार्षदों को आमंत्रित नहीं किया जा रहा है।
टूटे घरों के मलबे पर कांग्रेस ने साधी चुप्पी
सत्ता पक्ष और प्रशासनिक महकमे की इस भारी लापरवाही के बीच मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की भूमिका भी बेहद निराशाजनक रही है। शहर में इतनी बड़ी तोड़फोड़ हो गई, कई परिवार रातों-रात बेघर हो गए, लेकिन विपक्ष रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए है।
स्थानीय कांग्रेस के किसी भी बड़े पदाधिकारी या नेता ने अब तक चौड़ीकरण से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना तक मुनासिब नहीं समझा है। कांग्रेसी नेता सिर्फ अपनी डफली और अपना राग अलापने में पूरी तरह से व्यस्त नजर आते हैं।
दिखावटी प्रदर्शन से छिन रहा जनता का भरोसा
मुआवजे की राह जोह रहे पीड़ित नागरिकों का साफ कहना है कि जब उन्हें नेताओं की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब कोई भी उनके आंसू पोंछने नहीं आया। कांग्रेस सिर्फ छोटे-मोटे राजनीतिक मुद्दों पर दिखावटी प्रदर्शन कर अखबारों में जगह बनाती है।
विपक्ष की इस घोर उदासीनता और निष्क्रियता का सीधा असर उनके बचे-खुचे वोट बैंक पर पड़ रहा है। प्रभावित परिवारों ने स्पष्ट कर दिया है कि जो नेता संकट के समय साथ नहीं खड़ा हो सकता, आगामी चुनावों में उसे सबक सिखाया जाएगा।
शहर के आम नागरिक अब इन खोखले वादों, दिखावे की राजनीति और अधिकारियों के रील वाले विकास मॉडल को अच्छी तरह समझ चुके हैं। यदि जल्द ही सदन की बैठक बुलाकर मुआवजे का वितरण नहीं किया गया, तो यह आक्रोश बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।

