सरकारी ‘संजीवनी’ के आगे निजी अस्पताल फेल

धार एसएनसीयू ने 3200 नवजातों को दिया नया जीवन, प्रदेश के टॉप-10 में शामिल

धार, अग्निपथ। जब निजी अस्पतालों के बड़े-बड़े बिल और चमक-धमक वाले वार्ड नवजातों की उखड़ती सांसों को थामने में नाकाम हो जाते हैं, तब धार जिला अस्पताल का ‘एसएनसीयू’ (स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट) उम्मीद की आखिरी किरण बनकर उभरता है। पिछले दो वर्षों में निजी अस्पतालों से रेफर होकर आए 3500 से अधिक गंभीर नवजातों में से 3200 को मौत के मुंह से निकालकर नया जीवन दिया गया है। यह आंकड़ा न केवल सरकारी चिकित्सा पद्धति पर भरोसे की मुहर है, बल्कि उन निजी संस्थानों के लिए भी एक आईना है जो संसाधनों के नाम पर मोटी रकम तो वसूलते हैं, लेकिन नाजुक वक्त पर हाथ खड़े कर देते हैं।

निजी अस्पतालों की ‘नाकामी’ और सरकारी ‘कामयाबी’

हैरतअंगेज हकीकत यह है कि वर्ष 2024 और 2025 में इस यूनिट में भर्ती होने वाले कुल बच्चों में से 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे निजी अस्पतालों से रेफर होकर आए थे। जिन परिजनों ने बेहतर सुविधाओं की उम्मीद में निजी नर्सिंग होम में प्रसव कराया था, उन्हें अंततः नवजात की जान बचाने के लिए जिला अस्पताल की शरण लेनी पड़ी। 1 किलो से लेकर ढाई किलो तक के वजन वाले ये बच्चे पीलिया, निमोनिया और हाइपोथर्मिया जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे, जिन्हें सरकारी डॉक्टरों की टीम ने 24×7 निगरानी रखकर स्वस्थ किया।

आंकड़ों की जुबानी: मौत पर भारी पड़ती ममता और मेहनत

वर्ष निजी अस्पतालों से आए बच्चे सरकारी अस्पताल के बच्चे स्वस्थ होकर घर लौटे उपचार के दौरान मौत
2024 1642 927 2349 220
2025 1956 872 2559 269

यह यूनिट जेंडर रेश्यो (लिंगानुपात) को सुधारने में भी मौन भूमिका निभा रही है, क्योंकि स्वस्थ होकर लौटने वाले बच्चों में बेटियों की संख्या सर्वाधिक है।

स्पर्श की शक्ति: कंगारू केयर यूनिट का कमाल

दवाओं के साथ-साथ यहाँ ‘स्पर्श चिकित्सा’ का भी अनूठा प्रयोग किया जा रहा है। ‘कंगारू केयर यूनिट’ में माँ अपने शिशु को सीने से लगाकर बैठती है। यह थैरेपी कमजोर नवजातों को सुरक्षा और अपनत्व का अहसास कराकर उन्हें अंदर से मजबूत बनाती है। डॉ. ईश्वर रावत, डॉ. प्रियंक वर्मा और डॉ. अमित अग्रवाल की टीम 28 वार्मर के जरिए 24 घंटे इन नन्ही जानों की सुरक्षा में तैनात रहती है।

अभावों के बीच संघर्ष: सर्जन और ओटी की दरकार

प्रदेश के टॉप-10 एसएनसीयू में शुमार होने के बावजूद धार की इस यूनिट के पास अपनी ‘बेबी सर्जरी ओटी’ और विशेषज्ञ ‘सर्जन’ नहीं है। इस कमी के कारण जिन बच्चों को सर्जरी की आवश्यकता होती है, उन्हें आज भी इंदौर रेफर करना पड़ता है। यदि यहाँ यह सुविधा मिल जाए, तो मृत्यु दर को और भी कम किया जा सकता है।

“संसाधनों में सुधार और स्टाफ की मेहनत का परिणाम है कि मृत्यु दर में कमी आई है। अब निजी अस्पतालों से भी भरोसा करके लोग यहाँ आ रहे हैं। सर्जन की नियुक्ति के लिए उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया है।”

— डॉ. मुकुंद बर्मन, सिविल सर्जन, धार

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