महाकाल के नीलकंठ द्वार पर कारों का महाजाम, कागजी दावों की उड़ी धज्जियां

महाकाल के नीलकंठ द्वार पर कारों का महाजाम

एकतरफा ट्रैफिक प्लान ने बढ़ाई आफत

उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध भगवान महाकाल की नगरी में यातायात व्यवस्था को सुधारने के सारे प्रशासनिक दावे इन दिनों पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। पुलिस और प्रशासन मिलकर भले ही रोज नए-नए ट्रैफिक प्लान तैयार कर रहे हों, लेकिन धरातल पर लापरवाही के कारण हर योजना पूरी तरह फेल हो रही है। वीआईपी और बाहरी चार पहिया वाहनों को सीधे मंदिर के प्रवेश द्वारों तक आने की छूट मिलने से स्थिति बद से बदतर हो गई है।

ताजा अव्यवस्था महाकाल मंदिर के सबसे प्रमुख प्रवेश द्वारों में से एक ‘नीलकंठ द्वार’ के ठीक सामने देखने को मिल रही है। एसी कमरों में बैठकर नियम बनाने वाले अफसरों ने ग्राउंड जीरो की हकीकत जाने बिना एकतरफा आदेश लागू कर दिया है। इस अव्यवहारिक फैसले के कारण पूरे मंदिर क्षेत्र में दिनभर वाहनों का रेंगना और श्रद्धालुओं का परेशान होना अब एक आम बात बन चुका है।

कागजी अफसरों की अदूरदर्शिता: ई-रिक्शा पर पाबंदी, लेकिन लग्जरी कारों को खुली छूट

यातायात पुलिस ने कुछ दिनों पहले एक नया नियम लागू किया था जिसके तहत ऑटो और ई-रिक्शा को हरिफाटक ब्रिज पर ही रोकने का फैसला हुआ था। अधिकारियों का मानना था कि मंदिर के पास सबसे ज्यादा जाम इन्हीं छोटे यात्री वाहनों के कारण लगता है। इसलिए, उन्हें नीलकंठ द्वार की तरफ आने से पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया।

प्रशासन का यह नियम केवल गरीब ऑटो चालकों पर ही सख्ती से लागू होता दिखाई दे रहा है, जबकि रसूखदार कार मालिकों के लिए रास्ते खुले हैं। सैकड़ों कारों का काफिला बिना किसी रोक-टोक के सीधे नीलकंठ द्वार तक पहुंच रहा है। संकरी सड़कों पर इन बड़ी गाड़ियों के अनियंत्रित जमावड़े ने पूरे इलाके को एक बड़े ट्रैफिक जाम के दलदल में धकेल दिया है।

सिंहस्थ की तैयारी पर सवाल: 400 जवानों की भारी-भरकम फौज फिर भी बेअसर

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आगामी सिंहस्थ-2028 की शुरुआती तैयारियों और यातायात को पटरी पर लाने के लिए विशेष तौर पर 400 जवानों की तैनाती की गई है। इतने बड़े पुलिस बल के मुस्तैद होने के बाद भी सड़कों पर रेंगते वाहन प्रशासन की मुस्तैदी का मखौल उड़ा रहे हैं।

विभागीय तालमेल की कमी के कारण ये 400 जवान भी इस समय केवल मूकदर्शक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। सड़कों पर फैली अराजकता को रोकने के लिए कोई भी मैदानी स्तर पर कड़े कदम नहीं उठा रहा है। केवल छोटे वाहनों पर कार्रवाई कर अपनी पीठ थपथपाने वाली पुलिस बड़ी गाड़ियों के सामने पूरी तरह लाचार दिख रही है।

वीआईपी कल्चर का साइड इफेक्ट: मन्नत और कर्कराज जैसी विशाल पार्किंग स्थल पड़े खाली

यातायात के जानकारों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस गंभीर जाम को केवल एक छोटे से कदम से तुरंत नियंत्रित किया जा सकता है। मंदिर के आसपास मन्नत गार्डन, हरिफाटक ओवरब्रिज के नीचे और कर्कराज जैसे विशाल पार्किंग स्थल शासन द्वारा बनाए गए हैं।

इन सुरक्षित और व्यवस्थित पार्किंग स्थलों पर कारों को पार्क करवाने के बजाय पुलिस उन्हें सीधे मुख्य मार्ग पर आने की अनुमति दे रही है। यदि इन वीआईपी और बाहरी चार पहिया वाहनों को हरिफाटक ब्रिज के पास ही रोककर पार्किंग में भेज दिया जाए, तो नीलकंठ द्वार के सामने श्रद्धालुओं को पैदल चलने में भी इतनी परेशानी नहीं झेलनी पड़ेगी।

स्थानीय दबदबे के आगे लाचार खाकी: महाकाल घाटी और गुदरी चौराहे पर नियमों का सरेआम उल्लंघन

भले ही पुलिस ने ई-रिक्शा और ऑटो को हरिफाटक ब्रिज पर रोकने का दावा किया है, लेकिन इस दावे की पोल महाकाल घाटी पर खुल जाती है। मंदिर की इस बेहद महत्वपूर्ण और संकरी घाटी पर सुबह से लेकर देर रात तक ऑटो और ई-रिक्शा का अवैध कब्जा साफ देखा जा सकता है।

दरअसल, इसके पीछे स्थानीय कॉलोनियों के कुछ रसूखदार चालकों का सीधा दबदबा और गुंडागर्दी काम कर रही है। गुदरी चौराहे के पास की संकरी गलियों से ये रिक्शा चालक बेखौफ होकर मुख्य मार्गों में प्रवेश कर रहे हैं। मौके पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी इन नियमों को टूटते हुए देखकर भी अनजान बने रहते हैं।

लोकल वर्सेस बाहरी का नया विवाद: 10 किलोमीटर के दायरे की उठी मांग

इस पूरे ट्रैफिक संकट के बीच अब ई-रिक्शा चालकों के भीतर भी आंतरिक गुटबाजी और बाहरी लोगों के प्रवेश को लेकर भारी आक्रोश पनपने लगा है। ई-रिक्शा यूनियन के जिला अध्यक्ष बल्लू सिंह ठाकुर ने इस अव्यवस्था के लिए शहर से बाहर से आने वाले नौसिखिया चालकों को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया है।

यूनियन के पदाधिकारियों का कहना है कि उज्जैन शहर में चलने वाले अधिकांश नए ई-रिक्शा को बाहरी जिलों के लोग चला रहे हैं। इनमें से कई चालक तो नाबालिग हैं या फिर बेहद बुजुर्ग हैं, जिन्हें ट्रैफिक नियमों का बुनियादी ज्ञान तक नहीं है। मांग उठ रही है कि केवल 10 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले स्थानीय लोगों को ही रिक्शा चलाने का परमिट दिया जाए।

आरटीओ की रहस्यमयी चुप्पी: देवासगेट से लाल गेट तक बस संचालकों की मनमानी

उज्जैन शहर के भीतर का ट्रैफिक सिर्फ कारों और रिक्शों से ही नहीं, बल्कि अंतर्राज्यीय बसों की मनमानी से भी पूरी तरह चरमरा गया है। यातायात पुलिस और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) ने सभी बस संचालकों को सख्त हिदायत दी थी कि देवासगेट बस स्टैंड से निकलने के बाद बसें केवल तय स्टॉपेज पर ही रुकेंगी।

सवारी बटोरने के लालच में बस ड्राइवर इस सरकारी आदेश को रोज सरेआम हवा में उड़ा रहे हैं। बसें देवासगेट से लेकर आगर रोड, हरिफाटक ब्रिज और लाल गेट तक हर मोड़ पर जबरन खड़ी की जा रही हैं। बीच सड़क पर बसें रोकने से पीछे आ रहे दोपहिया और चार पहिया वाहन घंटों फंसे रहते हैं।

बेफिक्र अधिकारी: संतोष मालवीय की सुस्ती से पुराने शहर के लोग झेल रहे हैं मुसीबत

सड़कों पर मचे इस हाहाकार के बाद भी परिवहन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अपने दफ्तरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि आज तक न तो ट्रैफिक पुलिस के आला अफसरों ने और न ही आरटीओ संतोष मालवीय ने इन अवैध स्टॉपेज पर जाकर कोई ठोस कार्रवाई की है।

अधिकारियों की इसी लापरवाही का नतीजा है कि पूरे पुराने शहर में व्यापार करने वाले व्यापारी और आम राहगीर भुगत रहे हैं। सड़कों पर चल रहे विभिन्न निर्माण कार्यों के कारण वैसे ही रास्ते छोटे हो गए हैं, उस पर से इन बसों और कारों की अवैध पार्किंग ने आग में घी डालने का काम किया है।

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