नलखेड़ा, अग्निपथ। विश्व प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर में शासकीय प्रबंध समिति को दरकिनार कर एक गैर सरकारी समिति द्वारा गर्भगृह के सौंदर्यीकरण के नाम पर सोना, चांदी और नगदी रुपयों की अवैध वसूली का सनसनीखेज मामला सामने आया था। इस महाघोटाले के उजागर होने के बाद कलेक्टर प्रीति यादव द्वारा तीन सदस्यीय जांच दल का गठन किया गया था। अत्यंत विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इस जांच दल ने मामले में सीधे तौर पर लिप्त रसूखदार अधिकारियों और समिति के सदस्यों को बचाने के लिए एक सुनियोजित रिपोर्ट तैयार कर कलेक्टर को सौंप दी है। इस जांच रिपोर्ट को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है और इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है ताकि सच जनता के सामने न आ सके।
जांच के मुख्य बिंदु हटाकर रसूखदारों को दी क्लीन चिट
मंदिर में गैर सरकारी सुदर्शन सेवा समिति द्वारा अवैध रूप से लिए गए चढ़ावे के इस गंभीर मामले में कलेक्टर ने सात जुलाई को जांच दल गठित कर एक सप्ताह में रिपोर्ट मांगी थी। सूत्रों का कहना है कि जांच दल ने अपनी साख को ताक पर रखकर मुख्य बिंदुओं को ही गायब कर दिया। अवैध वसूली में लिप्त अधिकारियों और समिति के सदस्यों को बचाते हुए एक ऐसी रिपोर्ट तैयार की गई जिससे पूरी समिति को क्लीन चिट मिल गई। जांच के नाम पर की गई इस लीपापोती से जागरूक नागरिकों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
गठन के समय से ही संदेह के घेरे में था जांच दल
कलेक्टर द्वारा गठित इस जांच दल पर इसके गठन के पहले दिन से ही उंगलियां उठ रही थीं। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना था कि इस गंभीर घोटाले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जांच दल में कलेक्ट्रेट से उच्च स्तर के तटस्थ अधिकारियों को शामिल किया जाना चाहिए था। साथ ही, जांच शुरू होने से ठीक पहले इस कृत्य में सीधे तौर पर लिप्त अधिकारियों को उनके पदों से हटाया जाना चाहिए था, ताकि वे जांच को प्रभावित न कर सकें। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया गया।
सच दबाने की कोशिश: पत्रकारों के बहिष्कार की चेतावनी के बाद जारी हुआ था पत्र
अधिकारियों की मंशा प्रारंभ से ही इस पूरे संवेदनशील मामले को ठंडे बस्ते में डालने की थी। जब कलेक्टर द्वारा जांच दल का गठन किया गया, तब उस आदेश पत्र को छुपाने के पुरजोर प्रयास किए गए। कलेक्ट्रेट के जनसंपर्क कार्यालय तक में यह आदेश उपलब्ध नहीं कराया गया। जब स्थानीय पत्रकारों ने लामबंद होकर शासकीय समाचारों के पूर्ण बहिष्कार की चेतावनी दी, तब जाकर कहीं इस आदेश को सोशल मीडिया पर जारी किया गया। इस घटनाक्रम से साफ हो गया था कि जिला प्रशासन मामले पर लीपापोती करना चाहता है।
न पूछताछ हुई और न ही खंगाले गए बैंक खाते
जांच दल की कार्यप्रणाली केवल कागजी खानापूर्ति तक ही सीमित रही। आठ जुलाई को नलखेड़ा पहुंचे जांच दल ने केवल सुदर्शन सेवा समिति के सदस्यों द्वारा पेश किए गए चुनिंदा दस्तावेजों को ही रिकॉर्ड पर लिया। जांच दल ने न तो संदिग्धों से कोई तीखी पूछताछ की और न ही समिति के सदस्यों के बैंक खातों के लेन-देन (डिटेल) खंगालने की जहमत उठाई। इस सुस्त रवैये से साफ जाहिर है कि जांच महज एक औपचारिक नाटक थी।
दो हजार चौबीस से जारी थी अवैध वसूली, तत्कालीन अध्यक्ष मौन क्यों?
मंदिर के गर्भगृह में स्वर्ण एवं रजत सौंदर्यीकरण के नाम पर वर्ष दो हजार चौबीस से ही श्रद्धालुओं से अवैध रूप से सोना, चांदी और नगदी रुपये बटोरे जा रहे थे। इस दौरान शासकीय प्रबंध समिति मूकदर्शक बनी रही। तत्कालीन शासकीय प्रबंध समिति के पदेन अध्यक्ष मिलिंद ढोके ने इस खुली अवैध उगाही पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास क्यों नहीं किया, यह भी एक बड़ा और अनुत्तरित सवाल है।
गैर जिम्मेदार बयानों से अधिकारियों ने झाड़ा पल्ला
कलेक्टर प्रीति यादव का कहना है: “सभी लोगों को जांच रिपोर्ट के बारे में पता चल गया है, इसके लिए अलग से प्रेस नोट जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।” जब उनसे अवैध वसूली करने वाली समिति पर कार्रवाई के विषय में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि इस मामले में आप मंदिर के प्रशासक से बात करें।

