रिकाउंटिंग की उम्मीदों को मिली नई संजीवनी
उज्जैन, अग्निपथ। वर्ष 2022 में हुए उज्जैन नगर निगम के महापौर चुनाव को लेकर एक नया मोड़ सामने आया है। जिला प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश पी.सी. गुप्ता की अदालत ने कांग्रेस प्रत्याशी महेश परमार द्वारा दायर चुनाव याचिका को सुनवाई के योग्य मान लिया है। न्यायालय ने इस मामले में विपक्षी दल यानी भाजपा प्रत्याशी (महापौर मुकेश टटवाल), निर्दलीय प्रत्याशी और जिला निर्वाचन अधिकारी की ओर से याचिका को निरस्त करने के लिए लगाए गए आवेदनों को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही अब महापौर चुनाव की पारदर्शिता पर कानूनी बहस का रास्ता साफ हो गया है।
क्या है पूरा विवाद और रिकाउंटिंग की मांग
17 जुलाई 2022 को उज्जैन नगर निगम बोर्ड के लिए हुए चुनाव में भाजपा के मुकेश टटवाल को विजेता घोषित किया गया था। तत्कालीन जिला निर्वाचन अधिकारी आशीष सिंह द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मुकेश टटवाल को 1,34,320 मत मिले थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी और तराना विधायक महेश परमार को 1,33,417 मत प्राप्त हुए थे। इस प्रकार परमार को मात्र 923 मतों से पराजित घोषित किया गया था।
महेश परमार ने इस जीत को तत्काल चुनौती देते हुए रिकाउंटिंग (पुनर्मतगणना) की मांग की थी। परमार का आरोप है कि मतगणना के दौरान धांधली की गई और रिटर्निंग ऑफिसर ने पहले रिकाउंटिंग का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में बिना किसी ठोस कारण के उनकी मांग को खारिज कर दिया गया। इसी असंतोष के चलते उन्होंने न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मतगणना के आंकड़ों में हेराफेरी का गंभीर आरोप
महेश परमार की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ हाई कोर्ट अधिवक्ता रसिक सुगंधी ने अदालत में गंभीर तथ्य प्रस्तुत किए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन प्रक्रिया के प्रारूप 21-क में जानबूझकर असत्य आंकड़े दर्ज किए गए। एक विशिष्ट उदाहरण देते हुए बताया गया कि मतदान केंद्र क्रमांक 254 पर महेश परमार को वास्तव में 277 मत मिले थे, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड में इसे केवल 217 दर्शाया गया। इसके अलावा, करीब 60 वैध मतों को भी गलत तरीके से अस्वीकृत कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि इन आंकड़ों की सही ढंग से जांच और पुनर्मतगणना की जाए, तो चुनाव परिणाम पूरी तरह बदल सकते हैं। इसी आधार पर याचिका में पूरी चुनाव प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं।
न्यायालय का रुख: साक्ष्यों के बिना निष्कर्ष संभव नहीं
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद 19 फरवरी 2026 को अपना आदेश पारित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में सभी आवश्यक बिंदुओं का विस्तृत उल्लेख किया है और समर्थन में शपथ पत्र भी प्रस्तुत किया है।
माननीय न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि प्रतिवादियों (भाजपा प्रत्याशी व अन्य) द्वारा दी गई आपत्तियां प्रथम दृष्टया स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। न्यायालय ने कहा कि बिना साक्ष्य लिए इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि याचिका असत्य रूप से प्रस्तुत की गई है। इसी आधार पर आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत याचिका खारिज करने की मांग करने वाले आवेदनों को कोर्ट ने सिरे से नकार दिया।
प्रतिवादियों की दलीलें हुईं फेल
चुनाव याचिका को शुरुआती दौर में ही खत्म कराने के लिए महापौर मुकेश टटवाल और अन्य प्रतिवादियों ने तर्क दिया था कि यह याचिका विधिक प्रावधानों के विपरीत है। उनका दावा था कि इसमें वाद कारण का अभाव है और तथ्यों को छिपाया गया है। हालांकि, कोर्ट ने माना कि मामले की गहराई से जांच के लिए सुनवाई आवश्यक है, जिससे प्रतिवादियों की याचिका निरस्त करने की गुहार विफल हो गई।
राजनैतिक हलचल: परमार खुश, टटवाल बोले जानकारी नहीं
कोर्ट के इस फैसले के बाद उज्जैन की राजनीति में एक बार फिर सरगर्मी तेज हो गई है। कांग्रेस प्रत्याशी महेश परमार ने इसे सत्य की जीत की ओर पहला कदम बताया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला लोकतंत्र में विश्वास जगाने वाला है और हमें पूरा भरोसा है कि न्यायालय से हमें न्याय मिलेगा।
दूसरी ओर, वर्तमान महापौर मुकेश टटवाल ने इस मामले पर अनभिज्ञता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि उन्हें याचिका स्वीकार होने या आवेदनों के खारिज होने की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है, क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर ऐसी कोई याचिका दायर नहीं की थी। अब सबकी नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां साक्ष्यों के आधार पर महापौर की कुर्सी का भविष्य तय होगा।
