दूर का युद्ध, पास का संकट: पीथमपुर की रफ्तार पर ब्रेक, हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर मंडराया खतरा

nagda aluminium factory me chori 05 03 22

धार, अग्निपथ। हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता अंतरराष्ट्रीय तनाव अब मध्य प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र पीथमपुर की धड़कनों को थामने लगा है। जो युद्ध अब तक केवल टीवी स्क्रीन और खबरों तक सीमित था, उसका जमीनी असर अब फैक्ट्री की मशीनों की खामोशी और मजदूरों के चूल्हों की ठंडी होती आग में साफ दिखाई देने लगा है। करीब एक लाख कामगारों की इस औद्योगिक नगरी में आज अभूतपूर्व आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। कच्चे माल की किल्लत, गैस आपूर्ति में भारी कटौती और लॉजिस्टिक खर्च में बेतहाशा वृद्धि ने पीथमपुर के उद्योगों की कमर तोड़ दी है।

तीस हजार रोजगार खत्म, हजारों परिवारों पर आर्थिक मार

पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी के अनुसार, इस संकट की सबसे भीषण मार प्लास्टिक और पैकेजिंग उद्योग पर पड़ी है। कच्चे माल के दाम लगभग दोगुने हो जाने से कई इकाइयां बंद होने की कगार पर हैं। आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 20 हजार प्रत्यक्ष और 10 हजार अप्रत्यक्ष रोजगार पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। इसके अलावा, करीब 25 हजार कर्मचारियों के वेतन में 50 प्रतिशत तक की कटौती की गई है। जो फैक्ट्रियां पहले तीन शिफ्टों में चौबीसों घंटे चलती थीं, वहां अब केवल एक शिफ्ट में काम हो रहा है। क्षेत्र की लगभग 100 गैस आधारित यूनिट्स को मिलने वाली सप्लाई में भी 50 प्रतिशत की कमी आई है, जिससे उत्पादन ठप पड़ा है।

मिडिल ईस्ट पर निर्भरता और लॉजिस्टिक की पांच गुना बढ़ी लागत

इंदौर और पीथमपुर के लगभग 500 से अधिक उद्योग अपने कच्चे माल के लिए 60 प्रतिशत तक मिडिल ईस्ट के देशों पर निर्भर हैं। बहरीन, कतर और सऊदी अरब से आने वाले पेट्रोकेमिकल्स और बल्क ड्रग्स की आपूर्ति ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में बढ़ते जोखिम के कारण बाधित हो गई है। समुद्री मार्ग असुरक्षित होने से शिपिंग कंटेनर का भाड़ा 5 गुना तक बढ़ गया है। कांडला और जेएनपीटी बंदरगाहों से होने वाला निर्यात रुकने से विदेशी ऑर्डर्स निरस्त हो रहे हैं। चूंकि प्रदेश के कुल निर्यात में पीथमपुर की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है, इसलिए यह संकट पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।

फार्मा सेक्टर पर दोहरी मार, दवाओं की किल्लत की आशंका

औद्योगिक संकट का असर अब स्वास्थ्य सेवाओं तक भी पहुंच सकता है। एआईओसीडी के महासचिव राजीव सिंघल के अनुसार, कच्चे माल की कमी और गैस संकट से दवाओं का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पैरासिटामॉल पाउडर की कीमत 290 रुपये से बढ़कर 360 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जबकि ग्लिसरीन में 64 प्रतिशत का उछाल आया है। यदि अगले 10-12 दिनों में स्थिति नहीं सुधरी, तो बाजार में जीवन रक्षक दवाओं और इंजेक्शन की भारी कमी हो सकती है। फिलहाल उद्योगों ने जनता पर बोझ नहीं डाला है, लेकिन उत्पादन लागत बढ़ने से यह दबाव अधिक समय तक झेल पाना मुश्किल होगा।

ईंधन संकट और नकद भुगतान का बढ़ता दबाव

गैस कंपनियों ने न केवल आपूर्ति कम की है, बल्कि उधारी की सुविधा भी बंद कर दी है। अब उद्योगों को नकद भुगतान पर ही ईंधन मिल रहा है, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) खत्म हो रही है। यही नहीं, स्थानीय स्तर पर एलपीजी की कमी के चलते मजदूर वर्ग को ब्लैक में गैस सिलेंडर खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनके परिवार का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है।

संकट के प्रमुख बिंदु: एक नजर में

विवरणप्रभावित आंकड़े
कुल प्रभावित रोजगार30,000 से अधिक
वेतन कटौती25,000 कर्मचारियों की सैलरी आधी हुई
कच्चा माल20-30% तक की कीमतों में वृद्धि
परिवहन लागतलॉजिस्टिक खर्च में 5 गुना बढ़ोत्तरी
फार्मा कच्चा मालपैरासिटामॉल और ग्लिसरीन के दाम रिकॉर्ड स्तर पर

अतुल यादव, उद्योगपति पीथमपुर का कहना है:

“यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव जल्द खत्म नहीं हुआ, तो आने वाले समय में बड़े पैमाने पर ‘फैक्ट्री शटडाउन’ की स्थिति बन सकती है। इसका सीधा और भयावह असर उन लाखों मजदूरों पर पड़ेगा जो बाहर से आकर यहां अपना जीवन बसर कर रहे हैं।”

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