अर्जुनसिंह चंदेल
उज्जैन, अग्निपथ। संकट कटे, मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा। अर्थात जो हनुमानजी का स्मरण करता है, उसके संकट और पीड़ा दूर होने की मान्यता है। लेकिन भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र ‘खड़े हनुमानजी’ इन दिनों स्वयं संकट में नजर आ रहे हैं। करीब 500 वर्ष पुराने स्थान से उनकी मूर्ति को हटाकर दूसरे स्थान पर पुनस्र्थापित करने की तैयारी है। सवाल केवल स्थान परिवर्तन का नहीं है, सवाल उस नए स्थान की उपयुक्तता और उससे जुड़ी सदियों पुरानी आस्था का भी है।
प्रामाणिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि ‘खड़े हनुमानजी’ की मूर्ति करीब 500 वर्ष पूर्व यहां स्थापित हुई होगी। सदियों से यह स्थान उज्जैनवासियों की आस्था का केंद्र रहा है। शहर ही नहीं, दूर-दूर से माताएं अपने बच्चों पर आई बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना लेकर यहां पहुंचती हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि हनुमानजी के दर्शन और प्रार्थना से उन्हें संकटों से राहत मिलती है।
रामायण में हनुमानजी के साहस और पराक्रम के अनेक प्रसंग मिलते हैं—माता सीता की खोज, लंका में अपने अदम्य साहस का प्रदर्शन, संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाना और प्रभु श्रीराम के प्रत्येक कार्य में उनका साथ देना। त्रेता युग के वही नायक उज्जैन में कलियुग के इस दौर में स्वयं संकट में दिखाई दे रहे हैं।
सिंहस्थ आते रहे, संकट टलते रहे
उज्जैन में हुए अनेक सिंहस्थ—1980, 1992, 2004 और 2016—में ‘खड़े हनुमानजी’ की आस्था लगातार बनी रही। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि हनुमानजी ने अपनी शक्ति से हर संकट को टाल दिया। लेकिन 2028 का आगामी सिंहस्थ अपनी व्यापक तैयारियों के साथ सामने है और इसी सिंहस्थ की तैयारियों के बीच अब ‘खड़े हनुमानजी’ की पुनस्र्थापना का मामला सामने आ गया है। मामला मानो त्रेता युग की आस्था और आज की विकास योजनाओं के बीच उलझ गया है। मेरे आराध्य हनुमानजी को करीब 500 वर्ष पुराने स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर स्थापित करने की योजना है। जनकल्याण और व्यापक सुविधा के लिए हनुमानजी को दूसरे स्थान पर ले जाने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन जिस स्थान पर उन्हें स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है, उसकी उपयुक्तता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
प्रस्तावित नए स्थान पर ये आएंगी समस्याएं
वर्षाकाल में प्रस्तावित स्थान पर बारिश का पानी भरने की समस्या सामने आती है। इसके अलावा भी कई ऐसी व्यावहारिक समस्याएं हैं, जिन्हें देखते हुए इस स्थान को अंतिम रूप देने से पहले पुनर्विचार आवश्यक है। एक सामान्य व्यक्ति भी अपना घर बदलते समय आसपास का परिवेश, सुविधाएं, सुरक्षा और भविष्य की परिस्थितियां देखकर निर्णय लेता है। फिर बात जब सदियों पुरानी आस्था के केंद्र हनुमानजी की हो, तो स्थान का चयन और भी सोच-समझकर किया जाना चाहिए।
संकट बाहर से नहीं, अपनों से
‘हनुमानजी’ की सबसे बड़ी पीड़ा भी शायद अपनों से ही है। हिंदू समाज की अगुवाई करने का दावा करने वाली संस्थाओं द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों और अनेक हनुमान भक्तों की इच्छा के विपरीत ऐसे स्थान का चयन किया जाना, जिसकी उपयुक्तता पर सवाल उठ रहे हैं, चिंता का विषय है।
विकल्प: छत्रीचौक उद्यान बन सकता है आस्था का केंद्र
खड़े हनुमानजी मंदिर के वर्तमान स्थान और प्रस्तावित स्थल के समीप ही छत्रीचौक स्थित उद्यान में मंदिर के उपयुक्त स्थान उपलब्ध है। वर्तमान में यह उद्यान लगभग वीरान और उपेक्षित नजर आता है। यहां दिनभर अव्यवस्थित गतिविधियों की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि ‘खड़े हनुमानजी’ को इसी उद्यान में स्थापित किया जाता है, तो यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र के कायाकल्प का अवसर भी बन सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़ा गोपाल मंदिर इसी उद्यान के सामने स्थित है। ऐसे में यदि उद्यान में खड़े हनुमानजी विराजते हैं, तो दोनों धार्मिक स्थलों के बीच एक सुंदर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वातावरण विकसित किया जा सकता है। आज जो उद्यान उपेक्षित दिखाई देता है, वही हनुमानजी की उपस्थिति से श्रद्धालुओं और शहरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
- उद्यान में एक सुंदर और भव्य सभा मंडप बनाया जा सकता है, जहां नियमित रूप से भजन-कीर्तन, सुंदरकांड, हनुमान चालीसा और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन हो सकें।
- उद्यान के किसी उपयुक्त हिस्से में म्यूजिकल फाउंटेन विकसित किया जाए तो इसकी सुंदरता और बढ़ सकती है। रोशनी, हरियाली और धार्मिक वातावरण के साथ यह पूरा क्षेत्र एक ऐसा स्थान बन सकता है, जहां श्रद्धालु दर्शन के साथ कुछ समय शांति से भी बिता सकें।
समीप ही विजय मस्त हनुमान और टकसाली गणेश जी भी है। उन्हें ही इस स्थान पर लाया जाए। पास ही मजार और शाही मस्जिद भी है। तो फिर क्यों ने इस जगह को सांप्रदायकि सौहाद्र्र की मिसाल और धामिर्क सद्भाव की मिसाल बनाय जाए। जहां एक ओर मस्जिद से अजान की आवाज आए तो दूसरी ओर हनुमान चालीसा की गूंज वातावरण में सुनाई दे।

