अर्जुन के बाण: भगवान का वैभव स्थान का मोहताज नहीं

उज्जैन में खड़े हनुमानजी की प्रतिमा को लेकर इन दिनों भावनाएं उफान पर हैं। प्रतिमा को सडक़ चौड़ीकरण के लिए दूसरे स्थान पर ले जाने का प्रयास हुआ और प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली। इसके बाद आस्था, चमत्कार और विकास को लेकर बहस छिड़ गई है। प्रशासन ने भी फिलहाल प्रयास रोककर विशेषज्ञों और आगे के निर्णय की ओर रुख किया है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को एक दूसरे नजरिए से भी देखने की जरूरत है।

क्या भगवान का वैभव केवल उसी स्थान से जुड़ा होता है, जहां आज उनका विग्रह विराजमान है?

हमारा उत्तर है—नहीं।

इसलिए हमें उज्जैन के खड़े हनुमानजी के मामले को केवल ‘मूर्ति हटेगी या नहीं हटेगी’ के सवाल तक सीमित नहीं करना चाहिए।
बड़ा प्रश्न यह होना चाहिए— क्या हनुमानजी को वर्तमान स्थान से अधिक सुविधाजनक, अधिक भव्य और अधिक श्रद्धापूर्ण नए स्थान पर विराजित किया जा सकता है? जिससे कि उनका धाम उज्जैन के अगले सौ वर्षों के वैभव की पहचान बन जाए।

इतिहास के आइने में

भारत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां परिस्थितियों के कारण भगवान के विग्रह को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया गया और नए स्थान पर वह मंदिर आगे चलकर इतना प्रसिद्ध हुआ कि वही स्थान उसकी नई पहचान बन गया।

गोवर्धन से नाथद्वारा—श्रीनाथजी की नई पहचान

सबसे बड़ा उदाहरण श्रीनाथजी का है। गोवर्धन से विग्रह को ऐतिहासिक परिस्थितियों में सुरक्षित स्थान की ओर ले जाया गया। अंतत: मेवाड़ के जिस स्थान पर रथ रुका, वहीं श्रीनाथजी की स्थापना हुई। आज नाथद्वारा का नाम लेते ही श्रीनाथजी का स्मरण होता है। स्वयं नाथद्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट अपने इतिहास में श्रीनाथजी के नाथद्वारा आगमन को प्रमुख स्थान देती है। क्या श्रीनाथजी का वैभव गोवर्धन छोडऩे से कम हुआ? नहीं। नाथद्वारा स्वयं श्रीनाथजी की विश्वप्रसिद्ध पहचान बन गया।

वृंदावन से जयपुर—गोविंद देवजी

गोविंद देवजी का उदाहरण और भी सीधा है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार जयपुर के मंदिर में विराजमान गोविंद देवजी की मूर्ति महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय वृंदावन से जयपुर लेकर आए थे। आज जयपुर में गोविंद देवजी मंदिर प्रमुख धार्मिक केंद्रों में गिना जाता है। अर्थात विग्रह ने स्थान बदला, लेकिन भगवान की महिमा नहीं बदली। बल्कि जयपुर को भगवान गोविंद देवजी की नई पहचान मिली।

 

वृंदावन से करौली—मदन मोहनजी

मदन मोहनजी का मंदिर भी इसी परंपरा की याद दिलाता है। माना जाता है कि एक रात, राजा गोपाल सिंह को सपने में भगवान ने निर्देश दिया कि मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा वृंदावन के मंदिरों पर हमले से पहले वे अपनी मदन मोहन प्रतिमा को वृंदावन से राजस्थान ले आएं । निर्देशानुसार, करौली के राजा मदन मोहन की मूल प्रतिमा को रातोंरात अपने साथ ले आए और करौली में इस मंदिर का निर्माण करवाया। आज राजस्थान पर्यटन विभाग करौली के मदन मोहनजी मंदिर को प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में प्रस्तुत करता है।

 

स्थानांतरण और विस्थापन में फर्क

यह बात समझने की आवश्यकता है कि स्थानांतरण और विस्थापन एक ही बात नहीं हैं।
विस्थापन वह है जिसमें किसी आस्था को समाप्त कर दिया जाए।
स्थानांतरण वह है जिसमें उसी विग्रह को सम्मानपूर्वक नए स्थान पर ले जाकर धार्मिक परंपरा के अनुसार स्थापित किया जाए।
इसलिए यदि विशेषज्ञ यह तय करते हैं कि खड़े हनुमानजी की प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित किया जा सकता है, तो इसे आस्था की हार क्यों माना जाए?
बल्कि इसे हनुमानजी के नए और भव्य धाम की शुरुआत क्यों न माना जाए?

उज्जैन को एक अवसर दिखाई देना चाहिए

सिंहस्थ-2028 उज्जैन के सामने केवल सडक़ चौड़ी करने की चुनौती नहीं है। यह शहर को आने वाली पीढिय़ों के लिए बेहतर बनाने का अवसर है। लाखों-करोड़ों श्रद्धालु आएंगे। यातायात सुगम होना चाहिए। सडक़ें चौड़ी होनी चाहिए। आपातकालीन सेवाओं को रास्ता मिलना चाहिए। शहर की यातायात व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि श्रद्धालु धार्मिक यात्रा को परेशानी के रूप में नहीं, अनुभव के रूप में याद करें।
यदि खड़े हनुमानजी की वर्तमान स्थिति इस योजना में बाधा बन रही है, तो समाधान आस्था और विकास में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलना है।

नया खड़े हनुमान धाम – एक बेहतर कल्पना

नए स्थान पर भव्य मंदिर, पर्याप्त दर्शन क्षेत्र, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं, पाकिंग, दिव्यांग और बुजुर्ग श्रद्धालुओं के लिए सुविधा हो, हरियाली और स्वच्छता-ऐसा परिसर उज्जैन के लिए नई धार्मिक पहचान बन सकता है।

प्रशासन और श्रद्धालु साथ आएं

  • यह जरूरी है कि प्रशासन जल्दबाजी न करे। विशेषज्ञों की राय, तकनीकी परीक्षण, पुराताचिक दृष्टि और धार्मिक परंपराओं सभी को साथ लेकर निर्णय हो।
  • यह समय टकराव का नहीं, संकल्प का है।
  • प्रशासन कहे सडक़ भी बनेगी।
  • श्रद्धालु कह हनुमानजी भी विराजेंगे। और उज्जैन कहे दोनों साथ-साथ होगे।

हनुमानजी संकटमोचक है। उनके नाम पर ऐसा समाधान खोजिए जिससे उज्जैन का विकास भी हो और श्रद्धालुओं की भावना भी आहत न हो।

यही रास्ता आस्था का भी है।
यही रास्ता विकास का भी है।
और शायद यही रास्ता उज्जैन के भविष्य का भी है।

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