आस्था की कठिन डगर: 118 किमी की पंचकोशी यात्रा में दिखा नारी शक्ति का अटूट विश्वास

उज्जैन, अग्निपथ। उज्जैन की ऐतिहासिक 118 किलोमीटर लंबी पंचकोशी यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अटूट आस्था और कठिन तपस्या का प्रतीक है। इस वर्ष की यात्रा में भी करीब 25 हजार श्रद्धालुओं ने अपनी परिक्रमा पूर्ण की, जिसमें विशेष बात यह रही कि यात्रियों में महिलाओं की संख्या लगभग 90 प्रतिशत तक रही। वैशाख माह की भीषण गर्मी में सुख-समृद्धि की कामना के लिए महिलाएं 5 दिनों तक यह कठिन पैदल यात्रा करती हैं।

पंचकोशी यात्रा में महिलाओं की भारी भागीदारी के मुख्य कारण

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस यात्रा को आत्मा की शुद्धि और जन्म-जन्मांतर के पापों के नाश का मार्ग माना जाता है। महिलाओं की अधिक संख्या के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:

  • मोक्ष और पाप मुक्ति: मान्यता है कि वैशाख मास की इस पदयात्रा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

  • पारिवारिक खुशहाली: महिलाएं अपने परिवार, बच्चों और पति की लंबी उम्र तथा घर में सुख-शांति की मनोकामना के साथ इस अनुष्ठान को पूर्ण करती हैं।

  • परंपरा का निर्वहन: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की महिलाएं इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानती हैं।

  • महाकाल पर विश्वास: भगवान शिव के पांच प्रसिद्ध मंदिरों की यह परिक्रमा उज्जैन के धार्मिक जीवन का अभिन्न अंग है।

भीषण गर्मी और नंगे पैर श्रद्धा की परीक्षा

यात्रा के दौरान जब तापमान 35 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तब भी ये श्रद्धालु सिर पर अपनी पोटली रखे नंगे पैर पथरीले रास्तों पर चलते नजर आते हैं। महिलाओं का यह जज्बा उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है।

जन-सेवा और प्रशासन का सहयोग

श्रद्धालुओं की इस कठिन डगर को सुगम बनाने के लिए प्रशासन और उज्जैन के नागरिक कदम-कदम पर तैनात रहते हैं। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह भोजन और ठंडे पेय पदार्थों के स्टॉल लगाए जाते हैं। विशेष रूप से जब यात्री नगर सीमा में वापस लौटते हैं, तो स्थानीय रहवासी दान-पुण्य के उद्देश्य से उनकी सेवा में जुट जाते हैं। यही सेवा भाव और अटूट श्रद्धा पंचकोशी यात्रा को विश्व भर में विशिष्ट बनाती है।

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