100 बार रक्तदान करने वाले समाजसेवी अभय मराठे का निधन, संकल्प के अनुसार किया गया देहदान

उज्जैन, अग्निपथ। शहर को ‘नेगेटिव ब्लड ग्रुप’ की सुविधा देने वाले और स्वयं 100 से अधिक बार रक्तदान करने वाले प्रख्यात समाजसेवी अभय मराठे का 60 वर्ष की आयु में पुणे में निधन हो गया। उन्होंने अपनी बेटियों और परिवार के बीच अंतिम सांस ली। उनकी पत्नी के अनुसार, उन्होंने देहदान का संकल्प लिया था, जिसे उनके परिजनों द्वारा सम्मानपूर्वक पूरा किया जा रहा है।

दो साल से दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे थे मराठे

लोकमान्य तिलक विद्यालय की पूर्व प्राचार्य श्रीमती शुभा मराठे ने बताया कि उनके पति अभय मराठे पिछले दो वर्षों से ‘पॉलीसिथीमिया’ नामक बीमारी से ग्रस्त थे। यह एक अनुवांशिक बीमारी है जिसमें शरीर में रक्त गाढ़ा हो जाता है। स्थिति ऐसी थी कि उन्हें हर माह नया रक्त चढ़ाना पड़ता था क्योंकि उनके शरीर में ब्लड ड्रॉपआउट की समस्या हो रही थी। शनिवार रात करीब 10 बजे उन्होंने अंतिम विदा ली। उनके संकल्प को पूरा करते हुए पुणे के बीजे मेडिकल कॉलेज में उनका देहदान किया जाएगा। सोमवार सुबह देहदान की प्रक्रिया पूर्ण होगी।

1993 में रखी थी ‘नेगेटिव ब्लड ग्रुप’ की नींव

माधव साइंस कॉलेज और लोकमान्य तिलक स्कूल के पूर्व छात्र रहे मराठे पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) थे। वर्ष 1993 में जब शहर में नेगेटिव ब्लड ग्रुप की भारी कमी महसूस की गई, तब उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर ‘नेगेटिव ब्लड ग्रुप’ संस्था की स्थापना की। उनका उद्देश्य दुर्लभ रक्त समूह वाले मरीजों को समय पर सहायता उपलब्ध कराना था।

मराठी जत्रा और प्रोफेशनल ग्रुप के सूत्रधार

मराठी समाज की व्यावसायिक और सामाजिक गतिविधियों को मंच प्रदान करने के लिए उन्होंने ‘मराठी प्रोफेशनल ग्रुप’ का गठन किया था। संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ही ‘मराठी जत्रा’ की शुरुआत की थी। शर्मा परिसर में आयोजित होने वाली इस जत्रा में मराठी व्यंजनों और संस्कृति की अनूठी झलक मिलती थी, जिसका इंतजार आज भी शहर के खान-पान के शौकीनों को रहता है।

रक्तदान की होड़ और क्रांतिकारी सेवा

उनके करीबी मित्र गणेश गौड़ बताते हैं कि वे दोनों एबीवीपी के समय से साथी थे। दोनों के बीच रक्तदान करने की एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी। जहाँ अभय ने 100 बार रक्तदान किया, वहीं गौड़ ने 76 बार। इसके अलावा, शहीद पार्क पर क्रांतिकारियों के चित्र स्थापित करवाने में भी मराठे की प्रमुख भूमिका रही।

साहित्य साधना और राष्ट्रवाद की पहचान

अभय मराठे केवल समाजसेवी ही नहीं, बल्कि साहित्य के साधक भी थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में ‘अचिह्नित किस्से स्वतंत्रता की नींव से’ (भाग-1 और भाग-2) नामक दो चर्चित किताबें लिखीं। वे एक गहन राष्ट्रवादी, गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास के संकलनकर्ता, दीनदयाल परस्पर सहकारी साख संस्था मर्यादित उज्जैन के संस्थापक और क्रांतिकारी स्मरण समिति के अध्यक्ष के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते थे।

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