थांदला, अग्निपथ। जिले की प्रशासनिक कार्यवाहियों को देखकर आप आसानी से समझ सकते हैं। जिले मे प्रषासन का डंडा केवल गरीब मजलूम व जरूरतमंदों पर ही चल रहा है। बड़े और रसूखदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिये शासन के जिम्मेदारों से अनुमति लेना पड़ती है। प्रशासन स्वयं अपने निर्णयों का पालन करवाने में अक्षम साबित हो रहा है। इसके कई मामले थांदला में सप्रमाण देखे जा सकते हैं।
जिन मामलों को प्रशासन अवैध और नियम विरू़द्ध माना है उसके विरू़द्ध भी एसडीएम व तहसीलदार कार्यवाही करने में हिचकिचा रहे हैं और इसके उलट जिले में अतिक्रमण मुहिम के नाम पर गरीबों के घर तोड़े जा रहे हैं। उनकी गुमठिया तोड़ी जा रही है और गरीबों के घर और रोजी रोटी को खत्म पूरी ताकत से किया जा रहा है।
शासन-प्रशासन गरीबों के पेट पर लात मारने वालों को नहीं वरन गरीबों के पेट पर ही लात मार रहा है। क्या यह दोहरी व्यवस्था के परिचायक नहीं है। इसलिये कहा जा सकता है कि देश में अमीरों व गरीबों के लिये अलग-अलग कानून व्यवस्था है। प्रशासन की दोहरे मापदंडों के कुछ मामले जिसमें प्रशासन मूकदर्शक बना बैठा है।
मामला 1 : केशव उद्यान
नगर के एकमात्र खेल उपकरणों से सृजित केशव उद्यान को नगर परिषद ने जान बूझकर उजाड़ बनाया और उसके बाद सामुदायिक भवन पहुंच मार्ग के नाम पर उद्यान के हरे भरे वृक्षों को काटकर सीमेंट कांक्रीट रोड बनाया गया। जिसकी शिकायत होने पर कलेक्टर में उद्यान का निरीक्षण किया, उसके बाद भी सडक़ बनाने का कार्य नहीं रोका गया। मामला जब मीडिरूा की सुर्खियां बना तब प्रशासन ने उसे जनधन का दुरूपयोग व नियम विरूद्ध मानते हुए सडक़ को तोडक़र यथास्थिति बहाल करने के आदेश पारित किये। दो माह हो गये किन्तु आज तक प्रशासन ने कार्यवाही के नाम पर कुछ नहीं किया। सूत्रों की माने तो किसी बड़े राजनैतिक दबाव के चलते कार्यवाही नहीं की जा रही है।
मामला 2 : नियमविरूद्ध दुकान निर्माण
नगर परिषद द्वारा नगर के विभिन्न स्थानों पर करीब 60 दुकानों का निर्माण किया गया। जिसे प्रशासन नियम विरूद्ध माना व नजूल भूमि पर बिना वैध अनुमति के निर्माण कार्य को अवैध घोषित किया तथा पुरानी नगरपालिका चौराहे पर स्थित नाले पर बनी दुकानों को तोडक़र पूर्व स्थिति बहाल करने का आदेश विगत दो वर्षो से धुल खा रहा है। नतीजतन आज तक कोई कार्यवाही प्रशासन नहीं कर पाया। दुकानों का मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है किन्तु प्रशासन उससे भी आंख मूंदकर बैठा है।
मामला 3: शासकीय नाले पर कब्जा
नगर के बायपास मार्ग पर शासकीय सर्वे न 336 की भूमि पर एक निजी भूस्वामी ने अवैध कब्जा कर पास में बह रहे नाले को सीमेन्ट की दीवार बनाकर बंद करने की कोशिष की जिसकी भी शिकायत होने पर प्रशासन ने कार्य तो रूकवा दिया लेकिन अवैध कब्जेधारी के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की और ना ही नाले पर बनी दीवार को तोड़ा गया। बारिश के मौसम मे उस नाले पर बनी दीवार की वजह से नगर की अयोध्या बस्ती जलमग्न हो जायेगी किन्तु प्रशासन को उसकी कोइ चिन्ता नहीं है।
मामला 4: पदमावती नदी पर बना काम्प्लेक्स
नगर के बायपास मार्ग पर पदमावती नदी के किनारे पर निजी भूस्वामी ने नदी मे सीमेन्ट कांक्रीट की दीवार बनाकर उसके पास ही बायपास मार्ग के पास काम्प्लेक्स का निर्माण कर दिया। जिसकी शिकायत जयस कार्यकर्ता ने प्रशासन को जनसुनवाई के माध्यम से तथा ग्रीन टिब्युनल भोपाल में भी दर्ज करवाई थी। प्रशासन ने उक्त निर्माण कार्य को भी नियम विरूद्ध माना किन्तु उस पर भी कोई कार्यवाही आज तक नहीं हो पाई है।
जवाब देने से कतरा रहे अधिकारी
ऐसे ही अन्य कई मामले है जिस पर प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है। कई मामलों में प्रशासन स्वयं अतिक्रमणकर्ताओं के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। एसडीएम अनिल भाना से कार्यवाही मे लापरवाही के संबध मे पूछने पर उन्होंने तहसीलदार को कार्यवाही के लिये अधिकृत किये जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। वहीें तहसीलदार शक्तिसिंह चौहान ने संसाधनों और पर्याप्त बल की व्यवस्था नहीं होने की कहकर बात को टाल दिया। यही प्रशासन जब गरीबों के घर व रोजगार को उजाडऩे निकलता है तो सभी माकूल व्यवस्थाएं हो जाती है। प्रशासन की इस दोहरी व्यवस्था की मार केवल गरीब व जरूरतमंद लोगों पर ही दिखाई देती है।