अर्जुन सिंह चंदेल
कर्म-पथ पर कभी न झुके।
अग्निपथ पर कभी न रूके।
आज के ही दिन (11 दिसंबर) से ठीक 29 वर्ष पूर्व दैनिक अग्निपथ के संस्थापक लोह लेखनी के धनी, चंदेल परिवार के पितृ पुरुष ठाकुर शिवप्रताप सिंह चंदेल जी दिव्य ज्योति में विलीन हो गये थे। बहुत लंबा वक्त गुजर गया पिताजी के निधन को, पर आज भी उनकी सूक्ष्म उपस्थिति का हर पल एहसास होता है।
डॉ. गुलाब कोठारी के ये शब्द ‘बिना चिंगारी के व्यक्ति पत्रकार नहीं बन सकता। यही चिंगारी उसे एक सामान्य आदमी से अलग पहचान देती है। यह चिंगारी ही उसे कर्मरत रखती है।’
शायद उपरोक्त पंक्तियां पूरी तरह से पूज्य पिताजी के जीवन दर्शन में परिलक्षित होती थी। उसी चिंगारी के कारण उन्होंने प्रगतिशील चिंतक, क्रांति दर्शी प्रखर पत्रकार के रूप में समाज में स्थापित हुए। उनकी लेखनी का लोहा हर जगह माना गया। किसी भी तरह के प्रलोभनों से दूर रहकर वह प्रलोभन लेकर आने वाले की भी ऐसी धुनाई करते थे कि प्रस्तावक समर्थक त्राहिमाम-त्राहिमाम कर उठते थे।
वह कहते थे कि पत्रकार को डरने या भय प्रंकपित होने की कतई आवश्यकता नहीं है, पत्रकार जो भी मामला उठाये उसकी छानबीन पूरी क्षमता व सावधानी के साथ की जानी चाहिये। अन्यथा समाचार पत्र में उठाये गये मामले में छल-छिद्र होने पर पाठकों का विश्वास समाचार पत्र से डगमगा जायेगा।
इसी कारण जीवन के साथ-साथ पत्रकारिता में भी सम्पूर्ण पारदर्शिता के वे सम्पूर्ण शक्ति के साथ जीवन भर समर्थक रहे। अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ उन्होंने हमेशा कलम चलाई। दूसरे नये पत्रकारों को प्रेरणा दी। उनकी कलम आग उगलती थी।
पिताजी के शब्दों में प्रहारक, मारक और संहारक क्षमता थी, लेकिन संहार में नवनिर्माण के अमूल्य विचार भी छिपे होते थे, जो पाठकों को नित नयी ऊर्जा देते थे।
पत्रकार समाज को नयी दिशा देते हैं, बुराइयों को उजागर करते हैं, लोगों को उनका असली चेहरा दिखाते हैं। पिताजी ने इस दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ी। सारा जीवन वह संघर्ष करते रहे हर बुराई को बुराई बताकर उन्होंने एक स्वच्छ समाज के निर्माण में योगदान के लिये सतत् प्रयास किया। जो कह देते थे, उससे मुकरते नहीं थे। भ्रष्ट व्यक्तियों को कभी माफ नहीं करते थे।
मंत्री, सांसद, विधायक, राजनेता कोई भी क्यों न हो वह कभी किसी से नहीं डरे। उन्होंने पत्रकार की सही भूमिका को अपने आचरण से प्रदर्शित किया। पत्रकारिता एक जोखिम भरा कार्य होता है। अखबार चलाने का मतलब आग से खेलना और प्रशासन तंत्र का कोपभाजन बन मदोन्मुख शासन, बेईमान, भ्रष्ट मंत्रियों व अफसरों का मुकाबला करना है।
पिताजी को 60 वर्षों की पत्रकारिता के दौरान यह अनुभव कई मर्तबा हुए, लेकिन उन्होंने विषपायी की तरह सब सहा-भोगा भी। अपने लक्ष्य के लिये वह कभी डिगे नहीं। अच्छे कार्यों के लिये खतरे उठाना और व जोखिम सहना उनका स्वभाव और आदत बन चुका था।
वह अपने दृष्टिकोण पर कायम रहे। समाज को कुंठित करने वाली कुरीतियों, भेदभाव, शोषण, अन्याय और विकृतियों पर बेखौफ निर्भीकता से प्रहार करते रहे। देश की प्रगति मानव उत्थान और मानवतावाद की स्थापना ही उनका मुख्य ध्येय था। कहते हैं-मृत्यु भी सौन्दर्य है-कर्मयोगी पिता ने यथानाम तथागुण की सच्चाई अहम सत्य को आमंत्रित करके मृत्यु का भी स्वागत किया और गले लगाया। वह जिये भी शान से और मरे भी शान से। उनकी स्मृतियों को नमन्।