100 करोड़ से अधिक की शासकीय भूमि पर भूमाफियाओं का कब्जा

सुसनेर, अग्निपथ। इन्दौर कोटा राजमार्ग पर बेशकीमती शासकीय जमीन पर भूमाफियाओं के कब्जे की 12 साल पहले शुरू हुई जांच का अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। इस जांच में प्रशासन की भी रुचि नहीं है। उज्जैन संभाग के तत्कालीन आयुक्त द्वारा सन् 2012 में इसकी जांच के आदेश भी जिला और स्थानीय प्रशासन घोल कर पी गए।

नगरीय क्षेत्र में वर्तमान कीमत के हिसाब से 100 करोड़ रुपए से भी अधिक कीमत की शासकीय भूमि भूमाफिया के कब्जे में है और वे उसे खुलेआम बेच रहे हैं। खुलासे के बाद प्रशासन ने इनकी खरीदी बिक्री पर रोक लगाई थी। किन्तु नगरीय क्षेत्र में एक कालोनाइजर द्वारा 25 बीघा जमीन का भूमिस्वामी होने के बाद अभी तक 28 बीघा जमीन बेच दी गई है । इस मामले की जानकारी भी स्थानीय प्रशासन के पास है किन्तु वह भी इस और से उदासीन बना हुआ है ।

मामला नम्बर 1

कंठाल नदी के किनारे नीलकंठेश्वर महादेव मन्दिर तथा धर्मशाला स्थित श्री राम मन्दिर के नाम पर सर्वे क्रमांक 1907 तथा 1902 की 5 बीघा भूमि दर्ज है और इस भूमि पर दूसरे ही लोग खेती करते आ रहे हैं। 26 अप्रैल 2010 को इस जमीन व इसके पास लगी जमीन पर अवैध रूप से हुई हरे वृक्षों की कटाई के मामला सामने आने के बाद जांच में पता चला था कि इन्दौर-कोटा राजमार्ग से लगी सडक़ किनारे की यह जमीन बेशकीमती है। यह जमीन जिस क्षेत्र में है वहाँ की जमीन के भाव 4 से 5 हजार रूपये वर्ग फिट हैं। इस जमीन पर भूमाफिया ने कब्जा जमा रखा है। और वे इसे बेच रहे है रजिस्ट्री में सर्वे नंबर कुछ और दर्ज होता है और कब्जा किसी और नंबर पर कर लिया जाता है

मामला नम्बर 2

इन्दौर कोटा राजमार्ग पर थाने के सामने सोयत रोड पर सडक के किनारे की कई बीघा शासकीय भूमि राजस्व विभाग के रिटायर्ड हो चूके कुछ अधिकारियो ंकी मिली भगत के चलते भूमाफिया के कब्जे में है। शासकीय दस्तावेजों में हेराफेरी कर कुछ पर अपना नाम व कुछ पर अन्य को भूमिस्वामी बना दिया।

मांगे जाने पर तहसील कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराए रिकार्ड के प्रमाणित दस्तावेजो के अनुसार सर्वे क्रमांक 1906 रकबा 1.609 व 1908/1 रकबा 0.052 व 1899/4 रकबा 0.021, 1901 मि रकबा 0.219, 1901 मिन रकबा 0.439, 1905/1 रकबा 0.921, 1905/2 रकबा 0.021,1899/3 रकबा 0.031, 1999/5 रकबा 0.021, 1904/1 रकबा 0.041, 1900/1 रकबा 0.042, 1900/2 रकबा 0.021 व अन्य सर्वे नम्बर है जो 1976 तक तथा इससे पहले के रिकार्ड में शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है

इन नंबरों को कुछ तत्कालीन कर्मचारियों ने तहसीलदार व पटवारी से मिलकर इन नंबरों पर विभिन्न लोगों का अतिक्रमण दर्ज कर उनको भूमिस्वामी बना दिया। कुछ नंबरों पर बिना किसी कार्यवाही के पटवारी से फर्जी इन्द्राज करवा कर भूमि स्वामी दर्ज करवा दिया गया।

मामला नम्बर 3

इन्दौर-कोटा राजमार्ग पर थाने के समीप सर्वे भूमि क्रमांक 2003/2 जो की शासकीय थी। किन्तु इस भूमि पर नियमों की अवहेलना कर 1976 में पट्टा जारी किया गया। जबकि यह भूमि नगरीय सीमा में है। नियमो को ताक पर रख कर भूमि का नामान्तरण राजस्व विभाग ने दर्ज कर लिया तथा तत्कालीन पटवारियो की सांठगांठ से पटटे से प्राप्त भूमि का उल्लेख हटा कर भूमि का विक्रय प्रांरभ कर दिया

मामला क्रमांक 4

इन्दौर कोटा राजमार्ग पर आदिनाथ वेयर हाऊस के समीप सर्वे नम्बर 2093 रकबा 2.725 हेक्टेयर भूमि विक्रम संवत 2007 में जमीदारी प्रथा समाप्ती पर शासकीय भूमि के रूप में रिकार्ड में इन्द्राज थी तथा किंतु फर्जी तरीके से भूमि का विक्रय कर दिया तथा यह जमीन वारिस गणो ने अन्य लोगो को बेच दी एक शिकायत कर्ता द्वारा की गई।

शिकायत पर न्यायालय अपर कलेक्टर शाजापुर धमेन्द्र सिंह ने 24 फरवरी 2010 को दिऐ अपने निर्णय में यह माना था कि यह भूमि शासकीय माफी की भूमि थी न्यायालय अपर कलेक्टर ने इस मामले की जांच कर दोषी अधिकारी व कर्मचारियो के विरूध कार्यवाही के निद्वेश अनुविभागीय अधिकारी राजस्व को दिऐ थे। प्रशासन इस मामले में कुछ न कर सका।

भवानीपुरा में भी बिकी पटटे की जमीन समीप्रस्थ ग्राम भवानी पुरा में भी वर्ष 2011-12 तथा वर्ष 2012-13 में बडी संख्या में पटटे की जमीनो की खरीदी बिक्री का मामला सामने आया था। इन सब जमीनो की रजिस्ट्रीया इस अवधि में जिला पंजीयक कार्यालय शाजापुर में हुई थी।

इस संबध में जानकारी मिलने के बाद तत्कालीन तहसीलदार संजीव सक्सेना ने 2014 में जिला पंजीयक शाजापुर को पत्र भेजकर ग्राम भवानीपुरा में वर्ष 2011-12 और 2012-13 में हुई पटटे की जमीनो की खरीदी बिक्री का रिकार्ड उपलब्ध करवाने का अनुरोध किया था ।

इस पत्र की प्रति उपपंजीयक सुसनेर को भेजी गई थी किन्तु आजतक प्रशासन को इस संबंध में कोई जानकारी ही नही मिल पाई।

12 साल में भी सात दिन पूरे नहीं हुए!

इन सभी मामलो में लिखित शिकायत मिलने के बाद उज्जैन के तत्कालीन संभागायुक्त अरूण पांडे ने जांच के आदेश दिए थे। जांच के आदेश के बाद 7 दिन में प्रतिवेदन भी भेजा जाना था किन्तु अब तक मामले में कुछ नहीं हो पाया।

संभागायुक्त ने उपआयुक्त राजस्व उज्जैन संभाग के द्वारा तत्कालीन जिला कलेक्टर शाजापुर को पत्र क्र 4761 दिनांक 2 मई 2012 जारी कर जांच के आदेश दिए थे। जिला कलेक्टर ने पत्र क्र 430 दिनांक -30 मई 2012 जारी करके अनुविभागीय अधिकारी राजस्व सुसनेर को इस मामले की जांच कर प्रतिवेदन देने का लिखित आदेश दिया था किन्तु आदेश जारी होने के बाद अब तक जांच में क्या हुआ किसी को नहीं पता।

आगर के जिला बन जाने के बाद मई 2014 में आगर के तत्कालीन जिला कलेक्टर ने 4 सदस्यीय जांच दल का गठन कर मामले की जांच कराई थी। इस जांच दल में एसएलआर भी शामिल थे। जांच दल ने जांच करके अपना प्रतिवेदन भी दिया किन्तु वह न जाने कहा फाइलो में दफन हो गया। इन सभी शासकीय जमीनों को बेचने का खेल अभी भी जारी है।

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