कायथा, अग्निपथ। अभी तो मार्च की आहट ही हुई है, लेकिन कायथा और आसपास के क्षेत्रों में जल संकट के काले बादल गहराने लगे हैं। गर्मी के अपने चरम पर पहुँचने से पहले ही क्षेत्र की जीवनदायिनी छोटी कालीसिंध नदी का अधिकांश हिस्सा सूखकर मैदान में तब्दील हो चुका है। कुओं और ट्यूबवेलों ने भी अभी से दम तोड़ना शुरू कर दिया है, जिससे नागरिकों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।
भूजल स्तर में भारी गिरावट, पशुपालक भी बेहाल
ग्रामीणों के अनुसार, इस वर्ष जलस्तर उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से नीचे गिरा है। कई हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है, तो कई ट्यूबवेलों में घंटों मोटर चलाने के बाद भी बाल्टी भर पानी नसीब नहीं हो रहा है। स्थिति यह है कि आम जनता के साथ-साथ अब पशुपालकों को भी अपने मवेशियों की प्यास बुझाने की चिंता सताने लगी है।
अधूरा निर्माण: इस साल भी प्यासा रह सकता है नगर
राष्ट्रीय जल मिशन के तहत नगर में घर-घर पाइपलाइन तो बिछा दी गई है, लेकिन पानी की टंकी का निर्माण कार्य अब भी कछुआ चाल से चल रहा है। नर्मदा जल आपूर्ति की योजना, जो इस संकट का समाधान हो सकती थी, उसके इस साल शुरू होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। संभावना जताई जा रही है कि नगरवासियों को नर्मदा के पानी के लिए अगले साल तक का इंतजार करना पड़ेगा।
3 मुख्य माँगें: प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की उम्मीद
कायथा के नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि अप्रैल-मई की भीषण तपन आने से पहले ही ‘प्लान-बी’ तैयार किया जाए:
टैंकर व्यवस्था: अभी से प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति की योजना बने।
हैंडपंप मरम्मत: नगर के बंद और खराब पड़े हैंडपंपों को तत्काल प्रभाव से सुधारा जाए।
नर्मदा परियोजना में तेजी: जल निगम और संबंधित विभाग निर्माण कार्य में तेजी लाकर जल्द से जल्द ट्रायल शुरू करें।
समय रहते यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में कायथा में बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष की स्थिति बन सकती है।
