आगर मालवा, अग्निपथ। राजस्थान के घाटाखेड़ी में मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा की गई विवादित ड्रग्स कार्रवाई का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। बिना स्थानीय पुलिस को सूचना दिए दूसरे राज्य की सीमा में घुसकर की गई इस रेड की वैधानिकता पर लगातार गंभीर कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या महज दो थाना प्रभारियों के पास इतनी शक्ति थी कि वे बिना जिला पुलिस कप्तान की अनुमति के 100 पुलिसकर्मियों का भारी-भरकम बल इकट्ठा कर दूसरे राज्य में दबिश देने निकल जाएं?
रोजनामचे के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है वरिष्ठ अधिकारियों की रवानगी
विभागीय रोजनामचे के पुख्ता रिकॉर्ड बताते हैं कि 28 जनवरी 2026 को हुई इस दबिश के लिए तत्कालीन एसपी विनोद कुमार सिंह, एएसपी रवींद्र कुमार बोयट और एसडीओपी मोतीलाल कुशवाह की बकायदा सरकारी रवानगी और आमद दर्ज की गई थी। इन आला अधिकारियों के नेतृत्व में ही पूरा बल रवाना हुआ था। इस दबिश के बाद कोतवाली पुलिस आगर द्वारा राजस्थान के झालावाड़ जिले के ग्राम घाटाखेड़ी में की गई बहुचर्चित ड्रग्स कार्रवाई का प्रकरण दर्ज किया गया था।
न्यायालय के निर्देश पर डग थाने में दर्ज हुआ है मुकदमा
इस पूरे मामले में चौमहला कोर्ट के कड़े रुख और लगातार दिए गए प्रतिवेदनों के बाद राजस्थान के डग थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। वर्तमान में इस एफआईआर में केवल दो टीआई और अधीनस्थ जवानों के नाम ही सामने आए हैं। चूंकि राजस्थान की डग पुलिस को मध्य प्रदेश पुलिस के रोजनामचे की रवानगी और आमद की आधिकारिक जानकारी नहीं थी, इसलिए शुरुआती तौर पर केवल मौके पर मौजूद मातहतों के खिलाफ ही कानूनी प्रक्रिया शुरू हो पाई है।
मामले की निष्पक्षता के लिए आला अफसरों के बयान जरूरी
जिस कार्रवाई को बड़ी सफलता बताकर तत्कालीन एसपी विनोद कुमार सिंह ने प्रेस वार्ता में सुर्खियां बटोरी थीं, उसकी प्रक्रिया पर अब उंगलियां उठ रही हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस गंभीर और विवादित दबिश मामले की जांच में अब तक तत्कालीन एसपी, एएसपी और एसडीओपी के बयान तक दर्ज नहीं किए गए हैं। डग थाना प्रभारी भंवर सिंह के मुताबिक मामले की नए सिरे से गहन जांच की जा रही है, जिसे जल्द ही न्यायालय में पेश किया जाएगा।
पक्षपातपूर्ण कार्रवाई के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग
जनता और पुलिस महकमे के भीतर इस एकतरफा कार्रवाई को लेकर असंतोष पनप रहा है कि आखिर पूरे ऑपरेशन का हिस्सा रहे शीर्ष अधिकारी जांच के दायरे से बाहर क्यों हैं? जब गाड़ियों के इंतजाम से लेकर बल की रवानगी बड़े अफसरों के मार्गदर्शन में हुई थी, तो पूरी जिम्मेदारी सिर्फ मातहतों पर डालना न्यायसंगत नहीं है। राज्य शासन को इस पूरे प्रकरण की गहराई से उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि इस गंभीर मामले से जुड़े सभी तथ्यों का पूरी पारदर्शिता के साथ खुलासा हो सके।