उज्जैन में मोहन भागवत की युवाओं को सीख – धर्म ही जीवन का वास्तविक अनुशासन, इसे पूजा-पद्धति तक सीमित न रखें

उज्जैन में मोहन भागवत

उज्जैन, अग्निपथ।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने धर्म, पर्यावरण, युवाओं के आचरण और पड़ोसी देश पाकिस्तान का नाम लिए बिना भारत के प्रति उसके रवैये का स्पष्ट उल्लेख किया। भागवत ने युवाओं से विशेष अपील करते हुए कहा कि वे धर्म को केवल पूजा-पद्धति या कर्मकांड तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन और व्यावहारिक आचरण में उतारें। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं का जीवन ऐसा होना चाहिए, जिससे पूरा विश्व प्रेरणा ले सके।

वेस्टर्न कल्चर और रिलिजन से बिल्कुल अलग है भारतीय धर्म की अवधारणा

संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि धर्म और रिलिजन एक समान नहीं हैं। धर्म वास्तव में जीवन को संतुलित रूप से जीने का अनुशासन है। धर्म को लेकर भ्रम का एक बड़ा कारण अपनी भाषा और इसके वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। प्राचीन समय में पश्चिमी देशों के लोगों ने भारत में धर्म के आचरण, कर्मकांड और अनुशासन को देखा और इसे अपने यहां के रिलिजन के समान समझ लिया। बाद में भारत में भी धर्म को रिलिजन कहा जाने लगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंड-बैठक लगाना जरूरी होता है, उसी तरह धर्म के कर्मकांड और नियम इसके अभ्यास का हिस्सा हैं। कर्मकांड धर्म का एक अंग हो सकता है, लेकिन वह संपूर्ण धर्म नहीं है।

भागवत ने धर्म के व्यावहारिक पहलू पर जोर देते हुए कहा कि धर्म केवल पूजा या धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। हम भोजन करते हैं, लेकिन सड़क या आसपास कचरा नहीं फैलाते, यह भी धर्म है। अनुशासित रहकर ट्रैफिक के नियमों का पालन करते हुए चलना भी धर्म के अंतर्गत आता है। उन्होंने कहा कि अपनी उपासना-पद्धति, जो हमें प्रकृति, गुरु या परंपरा से मिली है, उसका पूर्ण सम्मान करना चाहिए। इसके साथ ही दूसरों की उपासना पद्धति का भी उतना ही सम्मान करना आवश्यक है। अपनी उपासना का सम्मान करते हुए दूसरों की आस्था का आदर करना और किसी का धर्मांतरण न कराना भी धर्म का ही एक अभिन्न अंग है।

पड़ोसी देश के अकारण विवाद के बावजूद भारत ने हमेशा निभाया अपना धर्म

पाकिस्तान का नाम लिए बिना भागवत ने कहा कि पश्चिम दिशा में स्थित एक पड़ोसी देश बिना किसी कारण के विवाद खड़ा करता है और बार-बार तकलीफ देता है। उसे कई बार कड़ा सबक भी सिखाया गया, लेकिन भारत ने कभी यह नहीं कहा कि विवाद करने के कारण वह वापस आ जाए या उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए। भारत में विभिन्न विचारधाराओं की सरकारें रही हैं, लेकिन दुनिया के संघर्षों में भारत ने कभी अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप नहीं किया। जिन लोगों ने भारत को तकलीफ दी, जरूरत पड़ने पर भारत ने मानवता के नाते उनकी मदद भी की और यह नहीं देखा कि वहां किस विचारधारा के लोग सत्ता में हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत के डीएनए में धर्म बसा हुआ है।

रामायण और गीता केवल रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाले ग्रंथ नहीं

युवाओं द्वारा धर्म के विषय पर मंथन करने पर खुशी व्यक्त करते हुए भागवत ने कहा कि आजकल धर्म के बारे में ऐसी चर्चाएं कम सुनाई देती हैं और कई लोग इसे बुढ़ापे की चीज मान लेते हैं। लोग सोचते हैं कि गीता और रामायण केवल रिटायरमेंट के बाद पढ़ने के ग्रंथ हैं, लेकिन यह सोच सही नहीं है। धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से लेकर अंत तक बना रहता है और सृष्टि का सब कुछ उसी के अनुसार संचालित होता है। व्यक्ति इसे स्वीकार करे या न करे, धर्म जीवन में हमेशा विद्यमान रहता है। जब कोई व्यक्ति अहंकार में आकर काम करता है और यह मानता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है तथा हर चीज उसकी इच्छा के अनुसार होनी चाहिए, तब उसे भारी गलतफहमी हो जाती है।

भौतिक सुख और मोक्ष का मार्ग भी धर्म के अनुपालन से ही संभव

संघ प्रमुख ने कहा कि जीवन में व्यक्ति भौतिक सुख, इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति चाहता है, लेकिन इनकी सही पूर्ति धर्म के पालन से ही संभव है। धर्म व्यक्ति को अंततः मोक्ष की ओर ले जाता है। उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी इच्छा को पूरा करने, डर, लालच या अपनी जान बचाने के लिए भी धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। सुख-दुख और अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां जीवन में आती-जाती रहती हैं, लेकिन धर्म हमेशा स्थायी और नित्य रहता है।

गीता भवन में जुटी देशभर की युवा प्रतिभाएं और मूर्धन्य विद्वान

उज्जैन के गीता भवन में 17 से 19 सितंबर तक सेवाज्ञ संस्थानम् के तत्वावधान में इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस युवा धर्म संसद में देशभर से करीब 1,700 युवा छात्र-छात्राएं हिस्सा ले रहे हैं। कार्यक्रम के दूसरे दिन करीब 300 विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य भी इसका हिस्सा बने। यह आयोजन सिद्धपीठ हनुमत निवास अयोध्या के पीठाधीश्वर एवं संरक्षक आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरणजी महाराज के मार्गदर्शन में संपन्न हो रहा है। आयोजकों ने बताया कि काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और काञ्चीपुरम् के सफल आयोजनों के बाद यह युवा धर्म संसद का छठा संस्करण है। अगले वर्ष इसका आयोजन द्वारका में किया जाएगा।

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