बदनावर: 95 प्रतिशत जलाशय ‘डेड वाटर लेवल’ पर सिमटे

एक पखवाड़े के बाद सूख सकते हैं तालाब, भीषण जलसंकट की आहट

बदनावर, अग्निपथ। सूरज के तीखे तेवर और बढ़ते तापमान की रफ्तार ने अब सीधे जलस्रोतों पर प्रहार करना शुरू कर दिया है। क्षेत्र के अधिकांश तालाबों की स्थिति वर्तमान में अत्यंत चिंताजनक हो चुकी है। हालात यह हैं कि अधिकांश जलाशय अभी से ‘डेड वाटर लेवल’ तक पहुंच चुके हैं। मौसम विभाग और जल विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले एक पखवाड़े के भीतर क्षेत्र के अधिकांश तालाब पूरी तरह सूख सकते हैं। यदि समय रहते स्थिति पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो ग्रामीण अंचलों में न केवल इंसानों के लिए पेयजल का संकट खड़ा होगा, बल्कि मवेशियों और वन्यजीवों के लिए बूंद-बूंद पानी जुटाना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।

सिंचाई के बाद अब कंठ सुखाने की बारी

बदनावर और तिरला विकासखंड को मिलाकर जल संसाधन विभाग के अधीन कुल 23 तालाब और 14 बैराज संचालित हैं। इन 34 जल संरचनाओं के माध्यम से लगभग 9708 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जाती है। बागेड़ी जैसे प्रमुख जलाशयों में सिंचाई के पश्चात नगर जलप्रदाय के लिए पानी आरक्षित रखने का प्रावधान है। लेकिन वर्तमान वास्तविकता यह है कि पाज, आसराकुंड, चंदनपाड़ा और बागेड़ी जैसे गिने-चुने बड़े तालाबों को छोड़कर शेष सभी जल संरचनाएं तेजी से मैदान में तब्दील हो रही हैं। जलस्तर में आई यह भारी गिरावट केवल भीषण गर्मी का संकेत नहीं, बल्कि एक विकराल जलसंकट की स्पष्ट दस्तक है।

क्यों सूख रहे हैं क्षेत्र के ‘लाइफलाइन’ जलाशय?

इस वर्ष उपजे संकट के पीछे कई भौगोलिक और मानवीय कारण उत्तरदायी हैं। गत वर्ष वर्षा का वितरण असमान रहा, जिससे कई तालाब अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार नहीं भर पाए। इसके अतिरिक्त जलाशयों के प्राकृतिक जलभराव मार्ग (कैचमेंट एरिया) में हुए अतिक्रमण ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। रबी सीजन के दौरान मावठा (बेमौसम बारिश) न गिरने के कारण किसानों की निर्भरता भूजल पर अधिक रही, जिससे अत्यधिक दोहन के कारण जलस्तर पाताल में चला गया। बदनावर तहसील वर्तमान में जिले के उन क्षेत्रों में शामिल है जहाँ भूजल का दोहन सर्वाधिक है, जो भविष्य के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।

अतिक्रमण और अवैध दोहन ने बढ़ाई मुश्किलें

जलसंकट की गंभीरता को बढ़ाने में अतिक्रमणकारियों की भी बड़ी भूमिका है। क्षेत्र की 89 ग्राम पंचायतों में स्थित कई तालाबों की जमीन पर जलस्तर घटते ही खेती शुरू कर दी जाती है। इससे पानी का दोहन और वाष्पीकरण दोनों तेज हो जाते हैं। विभाग की सख्ती के बावजूद अवैध पंपों के माध्यम से पानी खींचने का सिलसिला थम नहीं रहा है। विभाग के उपयंत्री एस.के. सिसोदिया के अनुसार, अवैध जल दोहन रोकने के लिए विद्युत वितरण कंपनी को पत्र लिखकर तालाब किनारे की बिजली आपूर्ति बंद करने का आग्रह किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य पशु-पक्षियों और मवेशियों के लिए न्यूनतम पानी सुरक्षित रखना है।

‘जल गंगा संवर्धन’ के जरिए बचाने की मुहिम

वर्तमान में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है, जिससे वाष्पीकरण की दर में भारी वृद्धि हुई है। जानकारों का कहना है कि इसी रफ्तार से गर्मी बढ़ी तो आगामी 15 दिनों में छोटे तालाब इतिहास बन जाएंगे। इस विकट स्थिति को देखते हुए विभाग द्वारा ‘जल गंगा संवर्धन’ अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत अधिकारी गांव-गांव जाकर ग्रामीणों को जल संचय के प्रति जागरूक कर रहे हैं। लोगों को समझाया जा रहा है कि तालाबों को संरक्षित करना केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी है।

यदि अब भी अतिक्रमण हटाने और जलमार्गों को पुनर्जीवित करने जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाला समय क्षेत्र के लिए अत्यंत कष्टकारी हो सकता है। प्रशासन और जनता को मिलकर इस अमृत रूपी जल को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करने होंगे, ताकि आने वाली गर्मियों में कंठ सूखे न रहें।

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