धार, अग्निपथ। आदिवासी अंचल इन दिनों महुए की मादकता से महक रहा है। प्रकृति का यह अनमोल उपहार आदिवासियों के लिए केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि उनके जीवन और रोजगार का मुख्य आधार बना हुआ है। आदिवासी समाज में महुए के वृक्ष को ‘कल्प वृक्ष’ की संज्ञा दी गई है, क्योंकि यह उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। भीषण गर्मी के इस मौसम में जब अन्य गतिविधियां सीमित हो जाती हैं, तब जिले के मांडू, कुक्षी और डही सहित तमाम वन क्षेत्रों में महुए के फूल टपकना शुरू हो जाते हैं। इन दिनों सुबह होते ही बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, पूरा परिवार हाथों में टोकरी लिए जंगलों और खेतों की ओर निकल पड़ता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि महुआ का उपयोग शराब बनाने में अधिक होने के कारण इसे अक्सर बदनामी झेलनी पड़ती है और इसके औषधीय गुणों को समाज में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसका यह हकदार है।
मार्च और अप्रैल में खिलती है महुए की बहार
महुए के पेड़ पर मार्च और अप्रैल के महीने में फूलों की बहार आती है। इस दौरान पूरा वनांचल इसकी मीठी गंध से सराबोर रहता है। यह वृक्ष औषधीय गुणों का खजाना है। न केवल इसके फूल, बल्कि इसके फल भी उतने ही उपयोगी होते हैं। जून के महीने में इस पर फल आने लगते हैं। इस तीन महीने के सीजन के दौरान हजारों टन महुआ फूल और फल एकत्रित किया जाता है, जिसका बाजार मूल्य लाखों रुपये होता है। इसके बावजूद आदिवासियों के जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं आ पाया है। इसका सबसे बड़ा कारण शासन स्तर पर इस क्षेत्र की उपेक्षा और स्थानीय स्तर पर सुव्यवस्थित मंडी का अभाव है। यदि प्रशासन पहल करे तो छत्तीसगढ़ की तर्ज पर यहाँ भी महुए से चटनी और अचार जैसे उत्पाद बनाकर आदिवासियों की आय बढ़ाई जा सकती है।
बिचौलियों के मुनाफे और आदिवासियों की मजबूरी
एक सामान्य आदिवासी परिवार सीजन के दौरान लगभग पांच क्विंटल फूल और एक क्विंटल फल संग्रहित करता है। स्थानीय स्तर पर मंडी की उचित व्यवस्था न होने के कारण ये परिवार अपनी मेहनत को बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हैं। वर्तमान में बिचौलिए 30 से 40 रुपये प्रति किलो महुआ फूल और 40 से 45 रुपये प्रति किलो फल खरीद रहे हैं। जैसे ही सीजन समाप्त होता है, यही बिचौलिए इस माल को दोगुने दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं। सरकारी हस्तक्षेप और उचित समर्थन मूल्य की व्यवस्था ही आदिवासियों को इन दलालों के चंगुल से मुक्त करा सकती है।
आधी रात से शुरू होती है कड़ी मशक्कत
महुआ बीनने का काम जितना सरल दिखता है, वास्तव में उतना ही कठिन है। ग्रामीण सुनील मेडा बताते हैं कि फूलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए उन्हें आधी रात से ही पेड़ों की रखवाली करनी पड़ती है। यदि समय पर ध्यान न दिया जाए तो जानवर इन फूलों को खा जाते हैं। महुआ का फूल एक-एक कर पेड़ से नीचे गिरता है और जमीन पर बिखर जाता है। अलसुबह पूरा परिवार इन मोतियों को इकट्ठा करने में जुट जाता है। दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद एक व्यक्ति मुश्किल से चार-पांच किलो फूल बीन पाता है। इसके बाद इन्हें तीन-चार दिनों तक तेज धूप में सुखाया जाता है, तब कहीं जाकर यह बाजार में बेचने लायक तैयार होता है।
मई माह में फलों के साथ लौटेगा महुआ का यौवन
मई का महीना आते ही महुआ के पेड़ों पर फल (डोली) आना शुरू हो जाएंगे। मई से अगस्त तक इन फलों का संग्रह किया जाता है। इन फलों से पौष्टिक खाद्य तेल निकाला जाता है जो आदिवासियों के भोजन का अहम हिस्सा है। जब महुआ पूर्ण यौवन पर होता है, तब सूर्योदय से पहले इसकी गंध पूरे वातावरण में फैल जाती है। यह महक न केवल मनुष्यों को, बल्कि कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों, लंगूरों और गिलहरियों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है। यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
आदिवासी अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़
आदिवासी समाज की आर्थिक स्थिति को मजबूती देने में महुए का पेड़ अहम भूमिका निभाता है। यह न केवल आय का स्रोत है, बल्कि सालभर जलाऊ लकड़ी की आपूर्ति भी सुनिश्चित करता है। इसकी छाल, फल और फूल का उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक उपचारों में किया जाता है। पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण इसकी पत्तियां और फूल पशुओं के लिए बेहतरीन आहार हैं। पशुपालकों का मानना है कि महुआ खिलाने से पशुओं के दूध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि होती है। ग्रामीण और वनवासी परिवारों के लिए यह सालभर की अतिरिक्त आय का सबसे भरोसेमंद जरिया है।
वन विभाग की नई योजना से जगी उम्मीद
महुए के संग्रह और बिक्री में सुधार लाने के लिए वन विभाग अब सक्रिय होता दिख रहा है। डीएफओ विजयानंतम टी आर ने बताया कि महुए के लाभ को आदिवासियों तक सीधे पहुँचाने के लिए एक विशेष योजना तैयार की जा रही है। हालांकि इस साल का सीजन लगभग निकल चुका है, लेकिन आगामी समय के लिए वनरक्षकों को गांवों में पेड़ों की गणना करने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग की योजना है कि हर गांव में एक समिति बनाई जाए, जो आदिवासियों द्वारा संग्रहित महुए को एकत्रित करेगी। इसके बाद विभाग के माध्यम से इसकी सीधी बिक्री करवाई जाएगी ताकि बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो और ग्रामीणों को उनकी मेहनत का उचित दाम मिल सके।
