मध्यप्रदेश के नगरीय निकाय चुनावों का समापन 20 जुलायी को हुयी मतगणना के साथ ही हो गया है। प्रदेश के लिये इस बार के नगरीय चुनाव इस कारण भी महत्वपूर्ण थे क्योंकि अगले वर्ष ही विधानसभा चुनाव होने हैं। राजनैतिक पंडित इन चुनावों को राजनैतिक दलों के लिये थर्मामीटर मान रहे थे चुनाव परिणामों से ही यह कयास लगाया जाता है कि मतदाता का मिजाज कैसा है? या इन परिणामों को हवा का रूख मापने वाला यंत्र कहा जा सकता है।
विगत 18 से अधिक वर्षों से सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिये नगरीय निकाय के चुनाव परिणाम किसी भी दृष्टि से शुभ नहीं माने जा सकते हैं। यदि हम मध्यप्रदेश के 16 नगर निगमों के चुनाव परिणामों की बात करें तो वर्ष 2015 हुए चुनावों में मतदाताओं ने 16 ही नगर निगमों में भारी मतों से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को विजयी बनाकर महापौर पदों पर आसीन किया था। निसंदेह प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह जी ने अनेक जनहितैषी कार्य किये हैं फिर ऐसा क्या हो गया कि मतदताओं का भाजपा से मोह भंग हो गया?
प्रदेश की 16 नगर निगमों में से पांच नगर निगमों ग्वालियर, जबलपुर, छिंदवाड़ा, मुरैना, रीवा पर मृत्यु शैय्या पर पड़ी 137 वर्षीय बूढ़ी और जर्जर काँग्रेस ने भाजपा से छीनकर कब्जा जमा लिया, वहीं सिंगरौली नगर निगम पर आप पार्टी ने कब्जा कर सबको चौका दिया है। कटनी में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा से पंगा लेकर पार्टी की बागी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर भाजपा को झटका दे दिया है।
वोट भी घटे
भारतीय जनता पार्टी मात्र 16 की जगह 9 नगर निगमों, भोपाल, इंदौर, खंडवा, रतलाम, देवास, बुरहानपुर, सागर, सतना और उज्जैन पर ही अपना कब्जा बरकरार रख सकी है। इसमें से भी इंदौर में जीत का अंतर पहले से आधा रह गया है, उज्जैन नगर निगम में वर्ष 2015 में हुए चुनाव में जहाँ मीना जोनवाल लगभग 24 हजार वोटों से जीती थी उस जीत का अंतर घटकर मात्र 736 वोटों का रह गया है, बुरहानपुर में तो भाजपा प्रत्याशी मात्र 542 वोटों से ही जीतने में कामयाब रही।
भाजपा के हाथ से निकले पांच नगर निगम
वर्ष 2015 के चुनाव परिणामों की तुलना में 16 में से 9 सीटों पर भाजपा कायम रह पायी अर्थात उसे 55 प्रतिशत सीटें मिली और 45 प्रतिशत का नुकसान हुआ इसे पार्टी के लिये सुखद नहीं कहा जा सकता। शायद भारतीय राजनीति में राजनैतिक दलों के आत्ममंत्रमुग्ध होने का वरदान ईश्वर प्रदत्त है तभी तो भाजपा इतना नुकसान उठाने के बाद भी अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं काँग्रेस भी इस उपलब्धि पर प्रसन्न हो रही है जबकि नेतृत्वविहीन काँग्रेस को यह सीटें मात्र सत्तारूढ़ भाजपा से मतदाताओं की नाराजगी की वजह से मिली है ना कि काँग्रेस की मेहनत का फल है।
मतदाताओं-कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करे
मध्यप्रदेश में भी मतदाताओं को यदि हर जगह सिंगरौली की तरह अच्छा विकल्प मिल जाता तो वह भाजपा-काँग्रेस की जगह ‘आप’ जैसा ही विकल्प चुनते। खैर विश्व की सबसे अधिक सदस्यों वाली भारतीय जनता पार्टी के लिये यह समय जश्न मनाने का ना होकर आत्मावलोकन व आत्मचिंतन का है। भाजपा के नगरीय निकाय के चुनाव परिणामों में हुए नुकसान के कारणों को ढूँढना होगा। मतदाताओं के साथ पार्टी के कार्यकर्ताओं की भी नाराजगी तलाश कर उन्हें दूर करना होगा।
विश्वास डगमगा रहा है?
कहीं ऐसा तो नहीं भाजपा के बड़े नेताओं के निर्णय के कारण काँग्रेस के थोकबंद नेताओं के भाजपा में प्रवेश के कारण पार्टी के निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्ताओं का पार्टी के प्रति विश्वास तो नहीं डगमगा रहा है? या कोई और कारण उसे भी खोजना होगा? मतदाताओं की नाराजगी का कारण भी तलाशना बहुत जरूरी है यदि कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की नाराजगी दूर नहीं की गयी तो विधानसभा 2023 के चुनाव परिणाम भी सत्तासीन भाजपा के लिये अप्रिय और नुकसानदायक हो सकते हैं।