– अर्जुन सिंह चंदेल
भारतीय जनता पार्टी द्वारा मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों के लिये अपने प्रत्याशियों की दूसरी सूची 25 सितम्बर को देर रात जारी की गयी। जिसमें 39 उम्मीदवारों के नाम, एक प्रत्याशी का नाम 26 सितम्बर को जारी किया गया है। शायद 25 सितम्बर का महत्वपूर्ण दिन इसलिये चुना गया कि भाजपा के पितृपुरुष दीनदयाल जी की जयंती का अवसर था और समय देर रात्रि का इसलिये कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उडऩखटोला प्रदेश की सीमा से काफी दूर जा चुका होगा।
सामान्यजन के लिये भले ही यह सूची चौंकाने वाली हो जिसमें 3 केन्द्रीय मंत्री और 7 सांसद हैं। परंतु राजनैतिक पंडितों के हिसाब से यह होना ही था। इस सूची से भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की 7.25 करोड़ जनता और 5 करोड़ 43 लाख मतदाताओं को कई संकेत भी दिये हैं।
भारतीय जनता पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व प्रदेश से आ रही गोपनीय सर्वे रिपोर्ट से काफी चिंतित था। निजी एजेंसियों का सर्वे तो ठीक था पर सबसे बड़ा संकट राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा कराये गये सर्वे की रिपोर्ट भी थी। इन दोनों सर्वे रिपोर्टों से स्पष्ट हो रहा था भाजपा इस बार गहरे संकट में है और अपनी क्षमता से अधिक मेहनत कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान लोक लुभावनी घोषणाएं करने के बावजूद भी चुनावी वैतरणी में भारतीय जनता पार्टी की नैय्या पार लगाने में सफल होते नहीं दिखायी दे रहे थे।
वर्ष 2018 के हुए चुनावों में काँग्रेस की विजय के कुछ माह बाद ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से जय को पराजय में बदलकर भाजपा सत्ता के सिंहासन पर बैठने में सफल हो गयी थी। बाद में हुए उपचुनावों में भी सिंधिया समर्थक विजयी होने में और भाजपा कुर्सी बचाने में सफल रही।
पर बीते साढ़े तीन वर्षों में काफी बदलाव आया है। पूरे प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की लोकप्रियता का जादू अब उतार पर है और उन तात्कालिक परिस्थितियों में जिन कार्यकर्ताओं ने अपनी कुर्बानी दे दी थी, जिनकी पीढिय़ां भारतीय जनसंघ से लगाकर भारतीय जनता पार्टी को पल्लवित, पोषित करने में लग गयी थी, उन कर्मठ कार्यकर्ताओं का संयम, धैर्य, सहिष्णुता, सहनशीलता भी उनके क्षेत्रों में हुए राजनैतिक अतिक्रमण के फलस्वरूप सब्र का बाँध तोड़ चुकी है।
बीते दिनों भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान रीति नीतियों से नाराज होकर दीपक जोशी, भंवर सिंह शेखावत जैसे और भी अनेक कद्दावर नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया है।
बगावत की उठी हवा कब भीषण चक्रवात का रूप ले ले शायद इसी को भाँपकर भाजपा के नीति निर्धारकों ने यह सूची जारी कर नुकसान की भरपायी की कोशिश की है। भाजपा की राजनीति में ‘वन मैन शो आर्मी’ का फार्मूला शायद केन्द्र में तो मोदी जी के कारण सफल हो गया है परंतु मध्यप्रदेश में यह दाँव शिवराज सिंह पर सफल होने पर पार्टी के सामने ही संशय खड़ा हो गया है।
आने वाले विधानसभा चुनावों में नेतृत्व का चेहरा बदलकर भी आक्रोश और बगावत के प्रभाव को कम किया जा सकता था परंतु वह समय भाजपा के हाथ से निकल चुका है।
शायद अपनी ही गलती को सुधारने के लिये भाजपा ने नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय जैसे कद्दावर नेताओं को दाँव पर लगाकर राजनैतिक बिसात पर चाल चल दी है। इसी सूची से यह भी संदेश है कि यदि भारतीय जनता पार्टी को बहुमत प्राप्त होता है तो पार्टी के पास मुख्यमंत्री पद के शिवराज सिंह जी के अलावा और भी चेहरे हैं ।
पार्टी ने अपने दिग्गजों को भी उन्हीं क्षेत्रों में विधानसभा प्रत्याशी बनाया है जिन क्षेत्रों से पार्टी को ज्यादा नुकसान होने की खबरें थी। क्षत्रपों को दाँव पर लगाकर भाजपा ने उन्हें भी संकेत दिया है कि यदि वह आसपास की सीटें भी भाजपा के पक्ष में नहीं कर पाये तो 2024 में भाजपा उन्हें टाटा करने पर विचार कर सकती है।
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