उज्जैन, अग्निपथ। उज्जयिनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की स्मृति में आयोजित ‘विक्रमोत्सव 2026’ के अंतर्गत शनिवार को अवंतिका नगरी एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव की साक्षी बनी। महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, स्वराज संस्थान संचालनालय और मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में पीपलीनाका रोड स्थित ऐतिहासिक गुमानदेव हनुमान गढ़ी पर वेद मंत्रों की भव्य अंत्याक्षरी प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस अनूठे आयोजन में शहर के विभिन्न गुरुकुलों से आए 400 से अधिक बटुकों ने अपनी मेधा और कण्ठस्थ वेद मंत्रों का प्रदर्शन कर उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
वैदिक ऋचाओं से गुंजायमान हुआ परिसर
कार्यक्रम के संयोजक और अनुष्ठान मंडपम ज्योतिष अकादमी के ज्योतिषाचार्य पंडित चंदन श्याम नारायण व्यास ने बताया कि शनिवार सुबह 10 बजे कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। सर्वप्रथम दीप प्रज्ज्वलन के साथ चारों वेदों का विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके पश्चात महाराजा विक्रमादित्य के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया गया। जैसे ही अंत्याक्षरी का प्रारंभ हुआ, पूरा परिसर शुक्ल यजुर्वेद संहिता के सस्वर पाठ और वैदिक ऋचाओं की गूँज से सराबोर हो गया। बटुकों ने जिस शुद्धता और गति के साथ मंत्रों का उच्चारण किया, उसने भारतीय गुरुकुल परंपरा की जीवंतता को एक बार फिर सिद्ध कर दिया।
कड़े मुकाबले में ललिता त्रिपुरा सुंदरी वेद विद्यालय रहा प्रथम
प्रतियोगिता अत्यंत रोचक और चुनौतीपूर्ण रही। विभिन्न चरणों के बाद परिणाम घोषित किए गए, जिसमें ललिता त्रिपुरा सुंदरी वेद विद्यालय के बटुकों ने अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा के बल पर प्रथम स्थान प्राप्त किया। कण्व वेद विद्यालय के छात्र द्वितीय स्थान पर रहे, जबकि तृतीय स्थान के लिए मोनी बाबा वेद विद्यालय और रामानुज कोट वेद विद्यालय के बीच कड़ा मुकाबला रहा और अंततः दोनों को संयुक्त रूप से विजेता घोषित किया गया। समापन अवसर पर अतिथियों द्वारा विजेता बटुकों को प्रमाण-पत्र, स्मृति चिह्न और नकद पुरस्कार राशि भेंट कर उनका उत्साहवर्धन किया गया।
आध्यात्मिक दिग्गजों का मिला सानिध्य
इस पावन आयोजन में उज्जैन के प्रतिष्ठित संतों और विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति रही। ऋणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर के गादीपति और अखिल भारतीय सनातन परिषद के संभागीय अध्यक्ष महंत महावीर दास जी महाराज का विशेष सानिध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिव शंकर जी मिश्र ने की। मुख्य अतिथि के रूप में विक्रम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. बालकृष्ण शर्मा उपस्थित रहे।
सारस्वत अतिथि के रूप में प्रसिद्ध गीता प्रचारक गीतानंद जी महाराज, विक्रमादित्य शोधपीठ के निदेशक व मुख्यमंत्री के संस्कृति सलाहकार श्रीराम तिवारी और डॉ. रमन सिंह सोलंकी ने भी आयोजन की शोभा बढ़ाई। अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि महाराजा विक्रमादित्य न केवल न्यायप्रिय शासक थे, बल्कि वेदों और कलाओं के महान संरक्षक भी थे। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ती है।
निर्णायक मंडल और व्यवस्था
प्रतियोगिता को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए विशेष निर्णायक मंडल का गठन किया गया था। इसमें वैदिक स्वप्निल लाखे और वैदिक पंडित राहुल शर्मा ने निर्णायक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम को सफल बनाने में युवा कथाकार पंडित कमलेश भाई जी, दिनेश रावल, पंडित गोपाल कृष्ण दवे, पंडित हेमंत जोशी, आचार्य पंडित अनुपम शर्मा और विजय प्रजापत सहित अनेक गणमान्य नागरिकों और स्वयंसेवकों का सराहनीय योगदान रहा।
विक्रमोत्सव के इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि आधुनिक युग में भी उज्जैन की प्राचीन गुरुकुल परंपरा अक्षुण्ण है और यहां के बटुक वेदों के ज्ञान को संरक्षित करने में पूरी निष्ठा के साथ जुटे हुए हैं।
