इंदौर/धार, अग्निपथ। मध्य प्रदेश वन विभाग में लापरवाही और अनुशासनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने महकमे की साख को दांव पर लगा दिया है। माननीय उच्च न्यायालय में लंबित एक महत्वपूर्ण याचिका और उससे जुड़े अवमानना प्रकरण में विभाग की ओर से बरती गई घोर लापरवाही अब खुद अधिकारियों के गले की फांस बन गई है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि कोर्ट के आदेशों की अनदेखी के चलते तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) विजय अंबाडे के खिलाफ जमानती वारंट तक जारी करना पड़ा है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद वन वृत्त इंदौर ने धार वन मंडलाधिकारी (DFO) को आड़े हाथों लेते हुए उनसे तत्काल स्पष्टीकरण मांगा है।
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी और विभाग की किरकिरी
पूरा मामला ग्राम शेरगढ़ की बेशकीमती वन भूमि से जुड़ा है, जहां विभागीय अधिकारियों की उदासीनता ने कोर्ट में सरकार का पक्ष कमजोर कर दिया। हाईकोर्ट में विचाराधीन याचिका (W.P. No. 41907/2025 – राधाबाई कटारा एवं अन्य बनाम राज्य शासन) में धार डीएफओ को प्रतिवादी क्रमांक-6 बनाया गया था। नियमानुसार, विभाग को समय पर अपना जवाब (OIC) नियुक्त कर पक्ष रखना था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि लंबे समय तक न तो प्रभारी अधिकारी की नियुक्ति की गई और न ही जवाब पेश किया गया। अधिकारियों की इस कुंभकर्णी नींद के कारण 18 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी करना पड़ा, जिससे विभाग की कानूनी स्थिति और जटिल हो गई।
शेरगढ़ जमीन विवाद: पट्टे की मांग और बेदखली का डर
विवाद की जड़ में धार जिले की बदनावर तहसील के ग्राम शेरगढ़ की 14.308 हेक्टेयर वन भूमि है। यहां के आदिवासी परिवारों ने वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत पट्टे की मांग करते हुए याचिका लगाई थी। उनका आरोप था कि वे लंबे समय से इस भूमि पर काबिज हैं और अपनी मांगों को लेकर लगातार प्रतिनिधित्व दे रहे हैं, लेकिन शासन स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया जा रहा। आदिवासियों ने आशंका जताई थी कि बिना किसी ठोस निर्णय के उन्हें जमीन से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है। इस पर हाईकोर्ट ने पहले ही निर्देश दिए थे कि सक्षम प्राधिकारी दो महीने के भीतर इस पर निर्णय लें और तब तक मौके पर यथास्थिति बनाए रखी जाए।
अवमानना केस में सख्ती: वारंट तक पहुंची बात
जब विभाग ने हाईकोर्ट के मूल आदेशों का पालन नहीं किया और जवाब दाखिल करने में कोताही बरती, तो मामला अवमानना (CONC No. 1817/2026) तक पहुंच गया। अवमानना प्रकरण की सुनवाई के दौरान भी जब वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई, तो कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन PCCF के खिलाफ वारंट जारी कर दिया। वन वृत्त इंदौर ने इस स्थिति को विभाग के लिए अत्यंत अपमानजनक माना है। मुख्य वन संरक्षक कार्यालय से जारी पत्र में धार डीएफओ को निर्देशित किया गया है कि वे तुरंत महाधिवक्ता कार्यालय में उपस्थित होकर विधिक प्रक्रिया पूर्ण करें और इस गंभीर चूक पर अपना विस्तृत स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें।
DFO की कार्यशैली पर सवाल: क्या अपनों को बचाने का है खेल?
इस पूरे घटनाक्रम ने धार डीएफओ की कार्यप्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। विभाग के भीतर यह चर्चा जोरों पर है कि क्या यह लापरवाही महज एक प्रशासनिक चूक है या फिर इसके पीछे किसी ‘खास’ को बचाने की सोची-समझी रणनीति? सूत्रों का कहना है कि निचले स्तर के कर्मचारियों की गलती पर पर्दा डालने और उन्हें बचाने के लिए मामले को जानबूझकर उलझाया गया। अब जब बात वारंट तक आ पहुंची है, तो जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपने का खेल शुरू हो गया है।
कहने को तो संबंधित डीएफओ की छवि अब तक एक ईमानदार अधिकारी की रही है, लेकिन इस हाई-प्रोफाइल मामले में उनकी चुप्पी और देरी ने कई सवाल पैदा कर दिए हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या डीएफओ अपनी साख बचाने के लिए दोषी कर्मचारियों पर निलंबन जैसी कड़ी कार्रवाई करेंगे या फिर उन्हें संरक्षण देना जारी रखेंगे। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा का विषय है कि क्या भ्रष्टाचार या लापरवाही पर पर्दा डालना ही अब नई कार्यशैली बन गई है। फिलहाल, इंदौर वन वृत्त की सख्ती ने धार से लेकर भोपाल तक के कार्यालयों में खलबली मचा दी है।
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