मालवा की समृद्ध लोकनाट्य माच परंपरा को शासन का प्रश्रय आवश्यक : सांखला

मालवा की विलुप्त हो रही लोकनाट्य माच परंपरा पर आधारित डॉक्यूमेंटेशन किया

उज्जैन, अग्निपथ। प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्था द्वारा संस्कृति संचालनालय म.प्र. शासन के सह आयोजन एवं संस्कृति विभाग नई दिल्ली, दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र नागपुर के सहयोग से आयोजित आठ दिवसीय अ.भा. संजा लोकोत्सव के अन्तर्गत मालवा की विलुप्त हो रही लोकनाट्य माच परंपरा पर आधारित डॉक्यूमेंटेशन किया गया। जिसमें गुरु बालमुकुंद घराने के युवा कलाकार सुधीर सांखला से एवं वरिष्ठ माच कलाकार बाबूलाल देवला (चिकली वाले) से चर्चा की गई जिसमें माच के अनेक पक्ष एवं इस कला को जीवित रखने के संघर्ष की पीड़ा सामने आई।

इस संबंध में सुधीर सांखला ने बताया कि आज मालवा की समृद्ध लोकनाट्य माच परंपरा को शासकीय प्रश्रय के साथ ही स्थानीय संस्थाओं के सहयोग की भी आवश्यकता है। आज के आधुनिक युग में जब लोग फिल्मों मे 8 से 10 सेकंड के शॉट के बाद आंखें कुछ नया देखने के लिए आदि हो चुके हैं, ऐसे में रात-रात भर देखा जाने वाला पारंपरिक माच निश्चित ही उपेक्षित हो रहा है। समय अनुसार आज के माच में बहुत बदलाव भी हुए हैं इसे जीवित रखने के लिए शासकीय स्तर पर सभी मंडलियों को सतत नाट्य मंचन के अवसर ऑक्सीजन का कार्य करेगी। आज के बदलते दौर में इस कला को आजीविका के रूप में नहीं अपनाना कठिन है इस कारण नई पीढ़ी इसे नहीं अपना रही है यही अवस्था रही तो एक समय बाद माच के कलाकारों को खोजना मुश्किल होगा।

सुधीर सांखला स्वयं भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले माच कलाकारों को अपने खेत पर नाटक की तैयारी के लिए जगह के साथ उनके रहने एवं भोजन की व्यवस्था भी करते हैं एवं आवश्यकता पडऩे पर समय-समय पर समय-समय पर आर्थिक मदद भी करते हैं। लोकनाट्य माच में अभिनय के चारों भेदों का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है जिसमें आंङिक अभिनय के अंतर्गत मालवी ढोल की थाप पर थिरकते कलाकार, वाचिक मे मालवी बोली में संवाद और गीत कथानक को सहज बनाते हैं, आहार्य के अंतर्गत ग्रामीण संस्कृति के अनुरूप वेशभूषा एवं रूप सज्जा और भाव संप्रेषण के माध्यम से सात्विक अभिनय को बड़े ही लोक रंजन तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

पूर्व में महिलाओं द्वारा मंच पर नृत्य या अभिनय करना समाज द्वारा अच्छा नहीं माना जाता था इसलिए पुरुष ही स्त्री का वेश धारण करते थे और वही परंपरा आज भी प्रचलन में है किन्तु अब महिलाएं भी इसमे हिस्सा लेते देखी जाती हैं। अ.भा. संजा लोकोत्सव द्वारा लोकनाट्य माच को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए लोकोत्सव का प्रतिवर्ष शुभारंभ माच की प्रस्तुति से करने हेतु संकल्पित है। जिसका सु परिणाम है कि आज माच मंडलियां अपने नाटक को योजनाबद्ध तरीके परिष्कृत कर लोकोत्सव में प्रस्तुति हेतु प्रतिक्षारत रहती हैं।

इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष वरिष्ठ माच गुरु बाबूलाल पंवार के निर्देशन में “देवर भौजाई” नाटक का खेला गया था। इस कला को जीवित रखने वाले कलाकार प्राय: गरीब एवं निम्न वर्ग के होते हैं वे शासन की योजनाओं को इंटरनेट पर खोजना, उनको पढऩा और शासन तक अप्रोच करना नहीं जानते हैं इसलिए वे शासन की योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते। शासन को चाहिए कि ऐसे कलाकारों को एकत्रित कर इन्हें बार-बार अवसर दे रहे देते रहे जिससे उनकी कला जीवित रहे, और युवा पीढ़ी को प्रशिक्षण देने का कार्य भी करें। संजा लोकोत्सव के तहत प्रतिवर्ष एक वरिष्ठ माच कलाकार को प्रतिकल्पा पारंपरिक लोक कला सम्मान से सम्मानित किया जाता है इसी श्रृंखला में इस वर्ष छोटेलाल भाटी, शेर मार खां को 22 सितंबर को सम्मानित किया गया।

अ.भा. संजा लोकोत्सव में आज से तीन दिवसीय लोकरंग जत्रा

अ.भा. संजा लोकोत्सव में आज से सतत तीन दिवसीय लोक रंग यात्रा का आरंभ होगा। जिसमें अनेक राज्यों कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन भिन्न-भिन्न गांवों एवं उज्जैन शहर में करेंगे। आज 28 सितंबर को ग्राम कनासिया में धर्मेन्द्र डान सांसद प्रतिनिधि के संयोजन मे दोपहर 1 बजे से संजा एवं मांडना की प्रतियोगिता, 4 बजे से कला प्रदर्शनी एवं शाम 7 बजे लोकरंग यात्रा के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अनूठा संगम रहेगा। इसी के साथ प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया जाएगा।

Next Post

महानंदा नगर में रिटायर्ड प्राचार्य बाथरूम में मृत मिले

Fri Sep 27 , 2024
उज्जैन, अग्निपथ। महानंदानगर में रहने वाले रिटायर्ड प्राचार्य घर की बाथरूम में मृत अवस्था में मिले। वे अपने मकान में अकेले रहते थे। सुबह से शाम तक दरवाजा नहीं खोलने पर पडोसियों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने घर में पहुंचकर उन्हें मृत पाया। इसके बाद शव बरामद कर […]