धार, अग्निपथ। सरकार सुरक्षित मातृत्व और संस्थागत प्रसव का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ती। करोड़ों रुपये के बजट और नारों की चमक-दमक के बीच धरातल का कड़वा सच धार के शासकीय भोज चिकित्सालय में सरेआम नीलाम हो रहा है। मातृत्व सुख की चाह में अस्पताल पहुंच रही गर्भवती महिलाओं को यहां व्यवस्था के आगे लाचार होना पड़ रहा है। जिला अस्पताल के मेटरनिटी वार्ड का आलम यह है कि एक ही बिस्तर पर दो-दो प्रसूताओं को अपनी तकलीफ साझा करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। जिन्हें पलंग तक नसीब नहीं हो पा रहा, वे फर्श पर दर्द सहते हुए अपनी बारी का इंतजार करने को विवश हैं।
संसाधनों के अभाव में घिसटती सेहत सेवाएं
अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई भी महिला वापस न लौटाई जाए, यह मंशा तो स्वागत योग्य है, लेकिन संसाधनों के टोटे ने इस नीयत का जनाजा निकाल दिया है। धार शहर के साथ-साथ पूरे जिले के सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से आने वाले रेफरल मामलों का बोझ इस अस्पताल की रीढ़ तोड़ रहा है। मेटरनिटी और महिला सर्जिकल वार्ड में क्षमता से अधिक मरीज आने के कारण हर कोना भरा पड़ा है। घाटाबिल्लौद की दुर्गाबाई और पिपलखूंटा की गौराबाई जैसे कई नाम हैं, जिन्हें महज तीन-चार फीट चौड़े पलंग पर साथ सुलाकर इलाज दिया जा रहा है। यह न सिर्फ महिलाओं के स्वाभिमान पर चोट है, बल्कि जच्चा-बच्चा दोनों में संक्रमण के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है।
आंकड़ों के भंवर में फंसा अस्पताल प्रशासन
अस्पताल के भीतर हालात कितने भयावह हैं, इसका अंदाजा सिर्फ तीन महीनों के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। अप्रैल, मई और जून के महीनों में यहां कुल 2,045 प्रसव कराए गए। इनमें से 1,627 सामान्य जबकि 418 सिजेरियन ऑपरेशन हुए। हर दिन औसतन 25 से अधिक प्रसव का दबाव झेल रहे इस अस्पताल में बेड खाली कराने की होड़ मची रहती है। सामान्य प्रसव वाली माताओं को जल्द से जल्द डिस्चार्ज कर दिया जाता है, लेकिन सिजेरियन ऑपरेशन के बाद कम से कम तीन से चार दिन तक मरीज को भर्ती रखना जरूरी होता है। नतीजा यह है कि वार्डों में हमेशा जगह की भारी किल्लत बनी रहती है।
100 बेड का ढांचा और सिजेरियन का बढ़ता पहाड़
वर्तमान में मेटरनिटी वार्ड में कुल 100 बेड उपलब्ध हैं, जिनमें से 40 प्रसव से पहले की देखभाल और 60 प्रसव के बाद के लिए तय हैं। जब रोजाना मरीजों का सैलाब उमड़ता है, तो यह 100 बेड का इंतजाम तिनके की तरह बह जाता है। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि सिजेरियन प्रसव 10 से 15 प्रतिशत के बीच होने चाहिए, मगर धार के इस अस्पताल में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत को पार कर चुका है। सिजेरियन के मामलों में इजाफे के कारण बेड लंबे समय तक घिरे रहते हैं और नए मरीजों की बारी नहीं आ पाती।
कब जागेगा सोता हुआ तंत्र
अस्पताल प्रशासन का तर्क है कि वे किसी जरूरतमंद को लौटा नहीं सकते और जगह बनते ही मरीजों को शिफ्ट कर देते हैं। लेकिन असली सवाल शासन और प्रशासन की दूरदर्शिता पर खड़ा होता है। जब सरकार खुद संस्थागत प्रसव का प्रचार कर रही है, तो अस्पतालों में बेड और सुविधाओं का विस्तार उस गति से क्यों नहीं किया गया? यदि वक्त रहते स्वास्थ्य ढांचे को मजबूती नहीं दी गई, तो सुरक्षित मातृत्व का यह बड़ा सपना केवल कागजी दावों और विज्ञापनों तक ही सिमट कर रह जाएगा।

