अर्जुन सिंह चंदेल, संपादक
वक्त रेत की तरह मुट्ठी से खिसकता जा रहा है, पता ही नहीं चला कब पिता जी ठाकुर शिवप्रतापसिंह जी द्वारा रोपे गये ‘अग्निपथ’ पर चलते-चलते 35 वर्ष गुजर गये। ‘अग्निपथ’ के जन्म के समय मैं मात्र 27 वर्ष का नवयुवक था अब मेरा बड़ा बेटा अभिमन्यु सिंह 36 वर्ष का हो चुका है। बीते 35 वर्ष अनेक झंझवातों से भरे हुये थे। ‘यथा नाम तथा गुण’ यह सचमुच ‘अग्निपथ’ ही है। एक पीढ़ी समाप्त हो चुकी है, दूसरी पीढ़ी के जीवन की सांध्य वेला है, तीसरी पीढ़ी पत्रकारिता के लिये प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने के लिये संघर्ष कर रही है। परिस्थितियां अनेक मायनों में प्रतिकूल कहीं जा सकती है।
पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों का ह्रास, सोश्यल मीडिया से कड़ी प्रतिस्पर्धा, प्रसार की घटती संख्या, नयी पीढ़ी की पढऩे में कम होती रूचि, ऐसे अनेक कारण है जो पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे की ज्योत को जलाये रखने में बाधा बनकर खड़े हैं।
धन्ना सेठों की संतान होते तो शायद इतना संकट ना होता परंतु रगों में दौड़ रहा राजपूती खून भी इसका बहुत बड़ा कारक है। पूज्य पिताजी ने पत्रकारिता के जिन मूल्यों को लेकर अग्निपथ की स्थापना की थी उन मूल्यों की रक्षा करना ही हमारा कत्र्तव्य है।
अग्निपथ पर चलने सच लिखने की कीमत चुकायी
स्वाभिमान की कीमत पर बीते 35 वर्षों में कभी कोई समझौता नहीं किया। फिर चाहे वह राजनेता हो, अफसर हो या उद्योगपति। हमने बड़े-बड़े अधिकारियों, नेताओं को पिताजी से सौजन्य भेंट हेतु अग्निपथ के द्वार पर आते देखा है इसलिये अधिकारियों या नेताओं की चौखट पर मुलाकात के लिये इंतजार में बैठना संभव नहीं। ऐसा नहीं है कि हमने सच लिखने की कीमत नहीं चुकायी हो, ‘अग्निपथ’ पर चलने और पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा के लिये कीमत चुकाना लाजिमी है।
कभी सच के लिये बाहुबलियों से संघर्ष, कभी पत्रकारिता के पेशे का ईमानदारी से कत्र्तव्यनिर्वहन, प्रशासनिक, पुलिस अधिकारियों के कोप भाजन बनने के रूप में तो कभी राजनेताओं के विरुद्ध सत्य लिखने की वजह से। सीमित संसाधनों के बीच दैनिक अग्निपथ का नियमित प्रकाशन ठीक वैसा ही था जैसे किसी प्रसूता को होने वाली पीड़ा। दैनिक समाचार पत्र को निकालना रोजाना प्रसव पीड़ा महसूस करने जैसा है।
परंतु सारी परिस्थितियों के बावजूद अग्रज अनिल सिंह चंदेल का चट्टान की तरह डटे रहना और पिताजी के ‘अग्निपथ’ रूपी पौधे को विशाल वृक्ष बनाने के सपने को साकार करने की धुन ने इस ‘अग्नि’ को बुझने नहीं दिया।
अनगिनत पाठकों, विज्ञापनदाताओं, अग्निपथ के मजबूत कॉमरेड साथियों, दूर-दराज के अंचलों में ‘अग्निपथ’ की मशाल को अपने श्रम से आगे बढ़ाने वाले संवाददाताओं को इस अवसर पर मैं विस्मृत नहीं कर सकता। ‘अग्निपथ’ के अवतरण दिवस पर सभी शुभचिंतकों को बधाई देता हूँ और सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, और यह वायदा करता हूँ कि ‘अग्निपथ’ पर चलता रहूँगा जब तक जान है साथ ही आगामी वर्ष 2025 में अग्निपथ की विकास यात्रा में कुछ नये आयाम और जोडऩे का प्रयास करूँगा।
जय महाकाल