गुड्डू कलीम हत्याकांड की कहानी – 4 : वजीर पार्क के मतदाता गुड्डू कलीम के फतवे का करते थे इंतजार

गुड्डू कलीम हत्याकांड guddu kalim

उज्जैन, (अर्जुनसिंह चंदेल), अग्निपथ।। वजीर पार्क कॉलोनी की भूमि चूँकि गुड्डू कलीम को सौगात के रूप में ही मिली थी इसलिये उसने दरियादिली दिखाते हुए मुस्लिम समाज के गरीब लोगों को कौड़ी के भाव में देना शुरू कर दिया। जो भी मजबूर इंसान उसके पास पहुँचता वह 1000-500 में ही उसे प्लाट दे देता। देखते ही देखते उसने पूरी वजीर पार्क कॉलोनी को रोशन कर दिया और मुस्लिमों का रहनुमा बन गया।

बसायी गयी वजीर पार्क कॉलोनी में बसने वाले लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज होते ही गुड्डू कलीम नेता के रूप में स्थापित हो गया। वजीर पार्क के 1400 वोट अब उसकी मु_ी में थे। गुड्डू के एहसान तले दबे सारे गरीब लोग उसकी एक आवाज पर मतदान करते थे। नगर-निगम के हो या विधानसभा-लोकसभा चुनाव सारे दलों के प्रत्याशी गुड्डू की चौखट पर दस्तक देने लगे। शातिर दिमाग गुड्डू कलीम ने इसका लाभ उठाया। अनपढ़ होने के बाद भी उसकी कार्यशैली काबिले तारीफ थी।

नेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों से नजदीकी के कारण उसने शासकीय भूमियों पर भी कब्जा कर लिया और ‘मन्नत गार्डन’ बसा दिया। वहाँ पर क्षिप्रा ढाबा खोलकर शहर के नामचीन अपराधियों की मदद से अवैध शराब का विक्रय भी होने लगा। लक्ष्मी ने गुड्डू का हाथ पकड़ लिया था। ताशपत्ती के शौकीन कलीम गुड्डू ने दोनों हाथों से संपत्ति अर्जित करना शुरू किया। दौलत के कारण उसके आसपास अपराधियों की फौज एकत्रित हो गयी जो साये की तरह दिन-रात उसके साथ रहती थी।

अब गुड्डू कलीम पुराना वाला गुड्डू नहीं रह गया था अब वह डॉन बन चुका था। जिले भर के विवादित जमीनों के प्रकरण उसकी अदालत में आने लगे जिनका फैसला वह करने लगा। उज्जैन शहर के सफेदपोश लोग प्रशासनिक अधिकारियों, नेताओं, महाकाल के पंडे-पुजारियों की अवैध दौलत उसके माध्यम से भूमि के सौदों में लगने लगी।

मुस्लिमों के बीच बन चुकी रहनुमा की छवि उसके काम आयी। वर्ष 2000 में हुये नगर निगम के पार्षद चुनावों में वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वार्ड क्रं. 31 से खड़ा हुआ और उसने भारी मतों से विजय प्राप्त की और काँग्रेस-भाजपा दोनों राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों को करारी शिकस्त दी।

सौभाग्य से पहली बार ही पार्षद बनने के बाद भी उसे मेयर इन कौंसिल में स्वास्थ्य विभाग का प्रभारी बनने का मौका मिल गया। पर अवैध कामों में लग जाने के कारण उसे राजनीति रास नहीं आयी। पूरे पाँच वर्षों के कार्यकाल के दौरान वह यदा-कदा ही निगम में नजर आया। कहते है ना संगत का व्यक्ति के जीवन में बहुत असर पड़ता है। उसके संगी-साथी उसे अच्छे कामों की ओर आने ही नहीं देते थे। जुआं, ताशपत्ती उसकी दिनचर्या बन गयी।

यदि उसे अच्छे दोस्त मिले होते तो वह मुस्लिमों का एकक्षत्र और सर्वमान्य नेता होता। क्यूँकि उज्जैन की राजनीति में स्वर्गीय मोहम्मद हुसैन खालवाला साहब और सुल्तान लाला के निधन पश्चात रिक्तता ही है। गुड्डू कलीम के पास 1400 वोटों की ताकत तो जरूर आ गयी थी पर यही ताकत उसके लिये मुसीबत का कारण भी बन गयी थी। क्योंकि हर चुनावों में उसे भारतीय जनता पार्टी या काँग्रेस में से किसी एक का साथ देना होता था।

यदि काँग्रेस का साथ दिया तो परिणाम आने के बाद भाजपा नाराज और भाजपा का साथ दिया तो काँग्रेस नाराज। साथ किसका दिया यह छुप नहीं पाता है वजीर पार्क के मतदान केन्द्र की पेटी की मतगणना के बाद ही पता चल जाता था कि गुड्डू कलीम ने किसके लिये फरमान जारी किया था। गुड्डू को क्या हुआ नुकसान?
अगले अंक 5 में…

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