नेताओं द्वारा बिहार में किये जा रहे चुनावी वायदे, भविष्य के लिये नुकसानदेह

Arjun ke Baan

अर्जुन के बाण

Arjun ke Baan

बिहार में होने जा रहे मतदान के लिये चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर है। विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश भारत में हमेशा की तरह राजनैतिक दल के नेता अपने-अपने डमरू लेकर मदारी की तरह बजा-बजा कर भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं। अलग-अलग मुखौटे लगाकर यह राजनेता एक बार फिर मेरे देश के भोलेभाले मासूम मतदाता को नोंचने और ठगने के लिये तैयार हैं। मेरे प्यारे देश का प्रजातंत्र जहाँ पूरे संसार में काबिले-ए-तारीफ है वहीं इस प्रजातंत्र का काला स्याह चेहरा भी है।

इसी देश का मतदाता एक पूर्व दस्यु उम्मीदवार को विजयी बनाकर देश के लिये नीति दिशा तय करने के लिये संसद में भेज देता है तो दूसरी ओर चुनाव आयोग के माध्यम से देश को स्वच्छ राजनैतिक वातावरण देने का प्रयास करने वाले पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन को हरा देता है। वाह रे प्रजातंत्र, देश में आजादी के बाद इतनी जागरूकता आने के बाद आज भी भारत की संसद में, प्रदेश की विधानसभाओं में गुंडे, बदमाश, बाहुबली, हत्या के आरोपी, बलात्कार के आरोपी भारी संख्या में चुनकर प्रजातंत्र के मंदिर संसद और विधानसभाओं में पहुँचकर अट्टाहास कर रहे हैं।

देश की आजादी के 73 सालों में हुए तमाम चुनावों के बाद भी हिंदुस्तान का भोलाभाला नासमझ मतदाता फिर अपने आपको ठगे जाने और लुटवाने के लिये तैयार है। इस समय बारी 7.8 करोड़ की आबादी वाले बिहार और मध्यप्रदेश की 28 सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव में यहाँ के मतदाता की है। चुनाव के समय बहरूपिये बनकर आये हुए नेता सब्जबाग दिखाकर, अनर्गल मुद्दों पर मतदाताओं को भ्रमित कर वोट लेकर चुनाव में विजयी होकर फिर 5 साल वापस लौटकर नहीं आते।

देश के सबसे गरीब पाँच प्रदेश बिहार, उत्तरप्रदेश, मणिपुर, झारखंड और असम में सिरमौर बिहार में यदि यहाँ 73 सालों से राज करने वाले राजनैतिक दल और नेता यदि हो चुके चुनावों में मतदाताओं से चुनावी घोषणा पत्र में किये गये वायदे ही पूरे कर देते तो आज बिहार स्वर्ग बन जाता, उसकी ऐसी दुर्दशा नहीं होती।

चाहे काँग्रेस हो, राजद या लोजपा सभी ने सिर्फ बिहार और बिहारियों का शोषण ही किया है इसके अलावा कुछ नहीं। पूरे भारत में बीते कुछ माह पूर्व जारी आँकड़ों अनुसार बेरोजगारी की दर लगभग 7 प्रतिशत थी, अर्थात 138 करोड़ की आबादी में से लगभग 10 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। बिहार में ही लगभग 12 प्रतिशत की बेरोजगारी दर है बिहार में लगभग 96 लाख लोग बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।

कोरोना काल में 12.20 करोड़ लोगों ने नौकरी से हाथ धोया था। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सी.एम.आई.ई.) के अनुसार मई 2020 में बेरोजगारी दर 23.48 प्रतिशत तक पहुँच गई थी। कोरोना संक्रमण की सबसे ज्यादा त्रासदी भी बिहार के मजदूर ने ही भोगी है। पेट की आग बुझाने के लिये अपने घर-परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर उसे महानगरों की शरण लेनी पड़ी, जहाँ विषैला धुआँ उगलती चिमनियों के नीचे उसने खून-पसीना बहाकर जो रुपया परिवार के लिये जमा किया था, वह लॉकडाउन में खर्च हो गया। बिहार के चुनाव में बहुत बड़ा वर्ग श्रमिक मतदाताओं का है, जिसने कोरोना संकट को भोगा है।
प्रथम चरण के मतदान के पूर्व नेताओं ने अपने चुनावी वायदों की झड़ी लगा दी है, परंतु जिस तरह के प्रलोभन दिये जा रहे हैं वह भारतीय प्रजातंत्र के लिये भविष्य में नुकसानदायक सिद्ध होंगे।

चुनाव जीतने के बाद सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने के बाद सरकारी नौकरियाँ देने की आस मतदाताओं में जगाई जा रही है। बढ़-चढ़कर बोलियाँ लगाई जा रही है। कोई दल 10 लाख तो कोई 19 लाख नौकरियाँ देने का वादा कर रहा है।

आजादी के बाद इतने सालों तक सत्ता में रहने वालों राजनैतिक दलों शर्म करो अभी तक क्यों नहीं दी सरकारी नौकरियाँ 15 साल जदयू ने शासन किया और लगभग 15 लाख राजद ने तब पद खाली होने पर भी नौकरियाँ क्या तुमने जानबूझकर नहीं दी? और यदि ऐसा किया है तो तुम लोग बेरोजगारों के गुनाहगार हो और इसके लिये दोषियों की जवाबदेही तय होनी चाहिये।

एक और तकलीफ देने वाली बात कही जा रही है मतदाताओं को। मौत का भय दिखाकर वोट माँगे जा रहे हैं कि यदि सत्ता में आयेंगे तो ही नि:शुल्क वेक्सीन मिलेगी और यदि दुर्भाग्यवश सत्ता में नहीं आ पाये तो बिहार और मध्यप्रदेश का गरीब मतदाता वेक्सीन के अभाव में मरने के लिये छोड़ दिया जायेगा।

वाह री राजनीति, वेक्सीन का अधिकार हर भारतीय का है और तुम क्या अपनी जेब से खर्च उठाओगे उस पर लगने वाला पैसा भी जनता का ही है जो उसने तुम्हें टैक्स के रूप में चुकाया है। नेताओं तुम जनता को वेक्सीन उपलब्ध कराकर कोई एहसान नहीं करोगे यह उसका अधिकार है। मेरे देश के मतदाता की भी विडंबना है प्रजातंत्र के चुनावी समर में एक नागनाथ है तो दूसरा साँपनाथ, इधर कुँआ उधर खाई। अच्छे लोगों के लिये राजनीति में अब जगह नहीं है, चापलूस, मक्कार, धूर्त, धन-बल वाले लोग ही राजनीति में आ सकते हैं इस कारण मतदाता के सामने वर्तमान में विकल्प नहीं है किसी एक तो चुनना ही पड़ेगा।
जय हो प्रजातंत्र की।

-अर्जुनसिंह चंदेल, संपादक

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